Pawan Jury BhilwaraRj
क्या मोदी सरकार पिछली यूपीए सरकार की तुलना में मीडिया को अपने वश में ज्यादा कर रही हैं? ( पार्ट – 1 )
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यह गलत धारणा पेड मीडिया द्वारा ही फैलाई गयी है कि मोदी साहेब मीडिया को कंट्रोल कर रहे है । असल में मीडिया को कंट्रोल करना किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं है। चाहे सरकार कितनी भी ताकतवर क्यों न हो !!
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पिछले 200 वर्षो में दुनिया के किसी भी देश की कोई भी सरकार प्राइवेट मीडिया को नियंत्रित नहीं कर पायी है। सरकार के पास प्राइवेट मीडिया को कंट्रोल का एक मात्र तरीका यह है कि — वह देश के सारे प्राइवेट मीडिया को बंद कर दे, और सिर्फ सरकारी मीडिया को काम करने अनुमति दे।
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मीडिया पूरी तरह से धनिकों के नियंत्रण में ही रहता है। और धनिकों में भी यह उन धनिकों के नियंत्रण में रहता है जो हथियारों का निर्माण कर रहे है। भारत का मीडिया हथियार बनाने वाली अमेरिकी-ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको के पूर्ण नियंत्रण में है, और वे ही भारतीय मीडिया के प्रायोजक है। जो नेता पेड मीडिया के प्रायोजकों के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम करते है उन्हें पेड मीडिया में कवरेज दिया जाता है, वर्ना नहीं दिया जाता। किन्तु लोकतंत्र का लिहाज रखने के लिए नागरिको को यह बुत्ता दिया जाता है कि नेता कंट्रोल कर रहा है !!
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चुनाव जीतने एवं छवि बनाए रखने के लिए सभी नेता पेड मीडिया के प्रायोजको का समर्थन चाहते है, अत: वे पेड मीडिया के प्रायोजकों से संपर्क करके कहते है कि, आप एक बार हमें मौका दो, और हम आपके एजेंडे को बेहद तेजी से आगे बढ़ाएंगे। इस तरह सभी पार्टियों के सभी नेताओं में पेड मीडिया का सपोर्ट लेने के लिए एक प्रकार का कम्पीटीशन रहता है। क्योंकि पेड मीडिया के पास भारत का सबसे बड़ा वोट बैंक है !!
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क्यों प्राइवेट मीडिया को कोई भी सरकार नियंत्रित नहीं कर सकती
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व्यवसायिक रूप से पेड मीडिया घाटे का धंधा है। जैसे जैसे मीडिया समूह विस्तार करता है, इसका घाटा भी बढ़ता जाता है। जितनी बड़ी मीडिया कम्पनी उतना ज्यादा घाटा। जितनी छोटी मीडिया कम्पनी उतना कम घाटा। अब आपको यह अजीब लगेगा कि ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन सच यही है कि मीडिया व्यवसायिक रूप से घाटे में ही चलता है।
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यदि आप सहज बोध (Common Sense) से इस दिशा में अवलोकन करना शुरू करेंगे तो इसे आसानी से समझ सकते है कि पेड मीडिया कैसे घाटे का धंधा है। और यदि आप इसे धरातल पर घटित होते देखना चाहते है तो, यह मानते हुए कि आपके पास 100 से 500 करोड़ की पूँजी है, एक मॉस मीडिया कम्पनी शुरु करने का प्रोजेक्ट बनाए और वास्तविक आंकड़ो की गणना करें कि एक राष्ट्रिय स्तर का अख़बार / चैनल शुरू करने के लिए आपको कितना पैसा लगेगा और इससे मासिक / सालाना कितनी कमाई होगी।
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यदि आप प्रोजेक्ट बनाने के लिए गंभीरत से प्रयास करते है तो 1-2 महीने में आपको आपकी ही प्रोजेक्ट रिपोर्ट यह बता देगी कि यह धंधा आपको किस दर से घाटा बनाकर देगा।
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उदाहरण के लिए इन्डियन एक्सप्रेस या टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की एक प्रति छापने में सिर्फ कागज एवं प्रिंटिंग की लागत 16 से 20 रू आती है, लेकिन आपको हॉकर यह प्रति 3 रू में दे जाता है !! आप सोचते है कि, शेष पैसा विज्ञापनों से आता है। लेकिन जब आप विज्ञापनों का हिसाब लगायेंगे तो मालूम होगा कि विज्ञापनों से 25 से 30% के आस पास लागत ही वसूल होती है। तो बाकी पैसा वे कहाँ से ला रहे है ? ये पैसा मीडिया समूह 2 स्त्रोतों से लाते है :
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(i) वे अपने प्रायोजको से अनुदान लेते है
(ii) वे खबरे बेचते है
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ख़बरें बेचने से आशय है कि किसी अख़बार के फ्रंट पेज पर जितनी भी खबरें छपती है उन्हें छापने का पैसा लिया जाता है !! मतलब, यदि दैनिक भास्कर ने फ्रंट पेज पर खबर लगाई है कि “Yes bank डूब गया” तो इसे छापने का पैसा लिया जाता है !! यदि पैसा नहीं दिया गया तो वे इस खबर को इस तरह ड्राफ्ट करेंगे कि सरकार के वोट कट जायेंगे !! तो अख़बार में Yes bank के डूबने की खबर तो आएगी, लेकिन ड्राफ्टिंग कैसी होगी, इसके लिए पेमेंट करनी होती है !! और इसी तरह से वे पूरा अख़बार बेचते है !! प्रत्येक खबर के एवज में पैसे लिए जाते है। और ठीक इसी तरह से टीवी पर भी खबरें बिकती है।
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राजनैतिक खबरों को खरीदने वाले दो वर्ग है। एक वर्ग राजनैतिक पार्टियाँ, नेता, सरकार है, और दूसरा वर्ग वे धनिक है जिनके धंधे को राजनैतिक नीतियाँ प्रभावित करती है। जो ज्यादा बड़ी बोली लगाएगा खबर का प्लाट उसे बेच दिया जायेगा !!
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अब पेड मीडिया के प्रायोजको को तो चुनाव नहीं लड़ना है, अत: मीडिया में जितना भी पैसा वे फूंक रहे है वह उनका घाटा है। इस घाटे को वे कवर कैसे करते है ? वे मीडिया को कंट्रोल करके नेताओं को कंट्रोल करते है, और फिर नेताओं से गेजेट में ऐसी इबारतें छपवाते है, जिससे उन्हें फायदा हो। और इस अतिरिक्त मुनाफे से वे अपना घाटा पूरा कर लेते है। तो व्यावसायिक रूप से मीडिया घाटा बनाता है, लेकिन राजनैतिक लाभ लेकर इसे मुनाफे में बदल लिया जाता है।
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अब यहाँ इस बात को समझना जरुरी है कि एक भ्रष्ट नेता गेजेट में ऐसी इबारतें नहीं छाप सकता जिससे वह बड़े पैमाने पर "कानूनी रूप से" पैसा बना सके। इसके लिए उसे भ्रष्टाचार करना होगा और वह जांच / संदेह के दायरे में आ जाएगा। लेकिन धनिक वर्ग के पास ऐसा इन्फ्रास्त्रक्चर होता है कि वे गेजेट में छापी गयी इबारतो से अरबों रूपये का अतिरिक्त मुनाफा बना सकते है। और यह मुनाफा पूरी तरह से कानूनी होगा, गैर कानूनी नहीं।
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सामंजस्य : यदि सत्ताधारी पार्टी पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो में नीतियाँ बनाती है तो सरकार एवं पेड मीडिया के प्रायोजको के आपसी सम्बन्ध मधुर बने रहेंगे, और नेता को सकारत्मक कवरेज मिलेगा।
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टकराव : और यदि सरकार पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के खिलाफ नीतियाँ बनाती है तो टकराव शुरू होगा। जब टकराव आएगा तो सरकार मीडिया को अपने फेवर में लेने की कोशिश शुरू करेगी। और फिर पेड मीडिया कर्मियों को कंट्रोल करने के सरकार के पास 2 रास्ते है :
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पैसे से खरीदना
पेड मीडियाकर्मियों को दबाव में लेना
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(1) पैसे से खरीदना : सरकार भ्रष्टाचार करके कितना भी पैसा बना ले किन्तु वे पेड मीडिया का घाटा पूरा नहीं कर सकते। भारत की बात करें तो लगभग 25 न्यूज चेनल एवं 50 बड़े अख़बार है जो प्रतिदिन खबरों के नाम पर अफीम बाँटते है। इसके अलावा फेसबुक, व्हाट्स एप आदि जैसी कम्पनियों का घाटा भी पूरा करना होता है।
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सरकार इतने बड़े स्ट्रक्चर का घाटा पूरा नहीं कर सकती। पेड मीडिया के प्रायोजक यह घाटा इसीलिए पूरा कर सकते है, क्योंकि उनके पास पैसे की बारिश करने वाले कारखाने है, और वे सालो साल से इन मीडिया समूहों का घाटा पूरा कर रहे है। मतलब अब यह बोली लगाने वाला मामला है। धनिक वर्ग सरकार से ज्यादा बोली लगाएगा और मीडियाकर्मी धनिक वर्ग की तरफ चला जायेगा।
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(2) मीडियाकर्मियों को दबाव में लेना : यदि सरकार पेड मीडियाकर्मियों को खरीद नहीं पा रही है तब वे मीडिया को दबाना शुरू करेंगे। किन्तु पेड मीडिया के प्रायोजको के खिलाफ जाकर मुख्य धारा के किसी मीडिया हाउस को दबाना भी मुमकिन नहीं है। क्योंकि पेड मीडिया के प्रायोजको के पास हथियार है !!
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पेड मीडिया के प्रायोजक अमेरिकन-ब्रिटिश-फ्रेंच बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक है। ये कम्पनियां फाइटर प्लेन, लेसर गाईडेड बम, लेसर गाइडेड मिसाईले, ड्रोन जैसी चीजे बनाती है। इन हथियारों पर नियंत्रण होने के कारण उनके पास वास्तविक ताकत है। अत: पीएम इन कम्पनियों को दबाने का प्रयास करेगा तो ये कम्पनियां उसे युद्ध में खींचेगी।
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(2.1) तो जब तक सरकार या पीएम के पास हथियार निर्माताओं से टक्कर लेने वाले हथियार ना हो तब तक पीएम सरकारी मीडिया को भी नियंत्रित नहीं कर सकता।
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(2.2) और प्राइवेट मीडिया को तो हथियार होने के बावजूद भी नियंत्रित नहीं किया जा सकता। क्योंकि प्राइवेट मीडिया का घाटा पूरा करने के लिए लगातार पैसा चाहिए होता है, जो कि सरकार के पास नहीं होता।
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(2.3) यदि सरकार प्राइवेट मीडिया को कंट्रोल करने की कोशिश करेगी तो उसे इसका अधिग्रहण ही करना पड़ेगा। और जैसे ही सरकार प्राइवेट मीडिया का अधिग्रहण करेगी यह सरकारी मीडिया हो जाएगा। और इस तरह पीएम को मीडिया पर कंट्रोल लेने के लिए सभी प्राइवेट मीडिया हाउस का अधिग्रहण करना पड़ेगा।
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(2.4) यदि पीएम देश के सभी प्राइवेट मीडिया हाउस का अधिग्रहण कर लेगा तो फ्रीडम ऑफ़ एक्प्रेशन का निलम्बन हो जाएगा और डेमोक्रेसी ख़त्म हो जायेगी !!
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दुसरे शब्दों में प्राइवेट मीडिया पर सरकार का नियंत्रण और डेमोक्रेसी साथ साथ एग्जिस्ट नहीं करती !! ये दोनों चीजे साथ साथ होती ही नहीं है। यदि किसी देश में प्राइवेट मीडिया है तो इसे हमेशा धनिक वर्ग ( हथियार निर्माता ) ही नियंत्रित करेगा, चाहे सरकार कितनी भी ताकतवर क्यों न हो।
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इसे फिर से पढ़िए - प्राइवेट मीडिया पर सरकारी नियंत्रण और डेमोक्रेसी साथ साथ एग्जिस्ट नहीं कर सकती है !!
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कुछ वास्तविक उदाहरण देखिये ;
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(a) स्टालिन : जोसेफ स्टालिन (1922–1953) ने बड़े पैमाने पर हथियारों का उत्पादन करना शुरू किया था, और उसने अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों को सोवियत रूस में आने की अनुमति नहीं दी। यदि स्टालिन प्राइवेट मीडिया को अनुमति दे देते तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक किसी न किसी तरीके से स्टालिन को चित कर देते। अत: स्टालिन ने मीडिया का 100% अधिग्रहण कर लिया और सोवियत रूस में डेमोक्रेसी ख़त्म हो गयी। आज रूस के पास अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के बराबर ताकतवर हथियार है, किन्तु मीडिया आज भी 100% रूसी सरकार के कंट्रोल में है। प्राइवेट मीडिया को वहां काम करने की अनुमति नहीं है। यदि रूस प्राइवेट मीडिया को आज भी अनुमति दे देता है, तो अगले 20-25 साल में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक रूस के फिर से 8 से 10 टुकड़े कर देंगे।
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वजह यह है कि, रूस के पास जूरी सिस्टम नहीं है। और जूरी सिस्टम न होने के कारण उनके पास हथियार निर्माण करने वाली निजी कम्पनियां नहीं है। रूस के सभी निर्णायक हथियार सरकारी कम्पनियां बनाती है। तो यदि रूस में प्राइवेट मीडिया खोल दिया जाता है, तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक निजी मीडिया को वहां पर सरकारी मीडिया से भी ज्यादा शक्तिशाली बना देंगे। सरकारी मीडिया इतना घाटा नहीं उठा सकेगा, और निजी मीडिया की तुलना में पिछड़ जायेगा।
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और एक बार यदि प्राइवेट मीडिया सरकारी मीडिया से ज्यादा ताकतवर हो गया तो पेड मीडिया का इस्तेमाल करके रूस के 5-7 टुकड़े करना मामूली बात है। तब रूस के राष्ट्रपति को देश बचाने के लिए फिर से प्राइवेट मीडिया का अधिग्रहण करना पड़ेगा !! तो स्टालिन को हथियार भी बनाने थे, और जूरी सिस्टम भी नहीं लाना था। तो फिर एक ही रास्ता बचता है – पेड मीडिया का अधिग्रहण किया जाए।
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(b) चेयरमेन माओ : माओ जिडोंग के साथ भी यही मामला था। उसे भी हथियार बनाने थे और जूरी सिस्टम भी नहीं लाना था। तो उसको भी सबसे पहले मीडिया का अधिग्रहण करना पड़ा। और फिर उसने सरकारी हथियार बनाने शुरू किये। यदि माओ अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को मीडिया चेनल खोलने देता तो वे अगले 5 वर्ष में ही चीन को आधा दर्जन टुकड़ो में विभाजित करके माओ को निपटा देते।
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चीन आज अपनी सेना काफी मजबूत कर चुका है, लेकिन आज भी यदि चीन प्राइवेट चेनल को अनुमति दे दे तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक बिना कोई युद्ध लड़े अगले 20 साल में चीन को के राजनेताओ पर कंट्रोल ले लेंगे। और पूरा मीडिया खोलने की भी जरूरत नहीं है। सिर्फ फेसबुक और गूगल को आने दो तो ये दो कम्पनियां भी चीन को काबू करने के लिए काफी है। चीन मीडिया में विदेशी निवेश खोल नहीं रहा है, और इस वजह से चीन को अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के साथ युद्ध लड़ना पड़ेगा।
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(c) हिटलर एवं मुसोलिनी : इन्होने भी वही ट्रेक लिया। मीडिया पर हिटलर का 100% कंट्रोल था। कोई प्राइवेट मीडिया नहीं। हिटलर बड़े पैमाने पर सरकारी हथियारों का निर्माण कर रहा था, अत: मीडिया पर कंट्रोल लेना जरुरी था। हिटलर मीडिया को छोड़ देता तो सेना नहीं खड़ी कर पाता।
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(d) ईराक-ईरान : सद्दाम हुसैन ने अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों को मीडिया चेनल नहीं खोलने दिए, अत: उसे अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के साथ युद्ध में जाना पड़ा। यदि ईराक प्राइवेट मीडिया आने देता तो अमेरिकी-ब्रिटिश शांतिपूर्ण तरीके से सद्दाम को हटाकर मिनरल्स टेकओवर कर लेते, और ईराक युद्ध से बच जाता।
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अभी ईरान भी इसी रास्ते पर है। ईरान में मीडिया पर काफी सेंसरशिप है। ईरान में वोटिंग होती है, लेकिन मीडिया पर 100% सरकारी नियंत्रण है। अभी ईरान यदि मीडिया में विदेशी निवेश खोल देता है तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक 5-7 साल में नागरिको को भेड़ा बनाकर ऐसे नेताओं को शीर्ष पर पहुंचा देंगे जो ईरान के मिनरल्स अमेरिकी कम्पनियों को देना शुरू करें। मतलब, ईरान में शिया-सुन्नी में घर्षण बढ़ जाएगा और अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां वहां पर “विकास” करने लगेगी। और विकास का सामान (यानी मिनरल्स) ख़त्म होने तक ईरानियो को मालूम ही नहीं चलेगा कि विकास किसका हो रहा था !!
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दुसरे शब्दों में, ईरान प्राइवेट मीडिया को अनुमति देने से इंकार करके ईरान के विकास में बाधा डाल रहा है, अत: अब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को न चाहते हुए भी पहले ईरान से युद्ध करना पड़ेगा और तब वे वहां पर विकास कर पायेंगे। क्योंकि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक असली "विकास पुरुष" है। उन्होंने पूरी दुनिया के उन देशो में विकास करने का संकल्प लिया हुआ है, जो हथियार भी नहीं बनाते है, और उनके पास मिनरल्स भी है !! रूस के पास भी काफी मिनरल्स है, किन्तु चूंकि रूस अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को टक्कर देने वाले हथियार बना चुका है, अत: अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिक वहां विकास करने नहीं जाते।
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(e) इंदिरा गाँधी जी : इंदिरा जी ने भी हथियार बनाने शुरू किये तो पहले उन्होंने दूरदर्शन के माध्यम से कम्पीट करने की कोशिश की। पर अंत में उन्हें आपातकाल लगाकर मीडिया पर प्रतिबन्ध लगाने पड़े। वे भारत की अब तक की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री थी, लेकिन प्राइवेट मीडिया को वे भी नियंत्रित नहीं कर पायी थी।
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(f) अमेरिका : अमेरिका के पास आज दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है, और इसके बावजूद अमेरिका के मीडिया पर वहां के हथियार निर्माताओ का ही नियंत्रण है, राष्ट्रपति का नहीं। पर चूंकि अमेरिका का मीडिया अमेरिकी धनिकों के ही नियंत्रण में है विदेशियों के नहीं, और अमेरिकी नागरिको के पास जूरी सिस्टम-राईट टू रिकॉल-जनमत संग्रह-मल्टी इलेक्शन एवं बंदूक रखने की आजादी है अत: वहां का प्राइवेट मीडिया अमेरिकी हितो का नुकसान नहीं पहुंचाता।
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ऊपर दिए गए सभी ताकतवर लोगो ने हथियार बनाने के बड़े पैमाने पर प्रयास किये और इन सभी को प्राइवेट मीडिया को प्रतिबंधित करना पड़ा। क्योंकि यदि ये लोग पेड मीडिया को काम करने की अनुमति दे देते तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक इन्हें गिराने में कामयाब हो जाते।
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मेरा बिंदु यह है कि असल में दुनिया की कोई भी सरकार आज तक प्राइवेट मीडिया को कंट्रोल नहीं कर पायी है। यदि सरकार के पास हथियार है तब भी सिर्फ सरकारी मीडिया नियंत्रित किया जा सकता है, प्राइवेट मीडिया को नहीं। प्राइवेट मीडिया से तालमेल बनाने का सिर्फ एक ही तरीका है – चुपचाप पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले क़ानून गेजेट में छापते रहो, और बदले में पेड मीडियाकर्मी नेताजी को जनता के सामने सुपरमेन बना कर दिखाते रहेंगे।
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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का सिंगल पॉइंटेड एजेंडा यह है कि कोई देश आधुनिक एवं निर्णायक हथियार नहीं बनाएगा !! और यह एजेंडा कोई छुपा हुआ नहीं है। एकदम खुली हुई बात है।
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ऊपर दिए गए लोगो ने हथियार बनाने शुरू किये और और इसीलिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के साथ इनका घर्षण बढ़ गया था। और इन लोगो को मीडिया पर प्रतिबन्ध लगाने पड़े।
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तो मनमोहन सिंह जी एवं मोदी साहेब का मीडिया पर कितना वश है ?
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शून्य !! जीरो !! अंडा !! मतलब = 0 !!
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सबूत ?
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पहली बात तो यह कि हम हथियार नहीं बनाते। असल में हम अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के हथियारों पर ही अपनी सेना चला रहे है। तो उनसे टक्कर लेने का सवाल ही नहीं। और जहाँ तक पैसे से खरीदने की बात है, न तो बीजेपी के पास उतना पैसा है और न ही कोंग्रेस के पास कि वे मीडिया खरीद सके। ये खुद ही विदेशियों के चंदे पर चल रहे है, मीडिया का घाटा किधर से पूरा करेंगे। अभी बीजेपी=संघ को विदेशियों से 950 करोड़ एवं कोंग्रेस को 150 करोड़ बेनामी इलेक्टोरल बांड से मिले है। इसी पैसे से इनकी आई टी सेल वगेरह के कर्मचारियों को वेतन आदि दिए जाते है, और इनके कट आउट, झंडी बैनर आदि छपते है।
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यदि संघ=बीजेपी मीडिया का घाटा पूरा कर सकती थी, तो वो पिछले 70 साल में अपना खुद का मीडिया हाउस स्थापित कर लेती थी। उन्होंने कोशिश भी की पर खड़ा नहीं कर पाए। पांचजन्य उन्होंने 1948 में और पाथेय कण 1987 में शुरू किया था। सरकार बना ली लेकिन अपना मीडिया खड़ा नहीं कर पाए !! और इसीलिए चुनाव जीतने के लिए उन्हें पेड मीडिया की जरूरत होती है।
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जवाहर लाल ने भी 1938 में नेशनल हेरल्ड नाम से पेपर शुरू किया था। यह लगातार वित्तीय संकट से जूझता रहा। अंत में अपडेटेड प्रिंटिंग मशीनों के अभाव में घाटा खाकर बंद हो गया !! एक समय पूरा देश ही कोंग्रेस को वोट करता था, लेकिन पेपर उनसे भी नहीं चला !! मलतब, सरकार बनाना आसान है, लेकिन मीडिया हाउस खड़ा करना और उसे चलाते रहना और उसे कंट्रोल करना उससे भी बड़ा काम है। जब तक आप हथियार बनाने की फैक्ट्रियां नहीं चला रहे हो तब तक आप प्राइवेट मीडिया को कंट्रोल नहीं कर सकते !! अभी 2017 में इन्होने नेशनल हेरल्ड का डिजिटल वर्जन ( यानी मुफ्त का मीडिया ) निकालना शुरू किया है।
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शिवसेना के पेपर “सामना” की भी यही दशा है। इसे 1988 में बाला साहेब ने शुरू किया था !! ये भी हमेशा हाशिये पर ही रहा, मुख्य धारा में नहीं आ पाया।
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ये सब तो सामने के प्रयास है। इसके अलावा परदे के पीछे से भी एंट्री मारने के काफी प्रयास इन्होने किये। असल में कोंग्रेस, संघ=बीजेपी, शिवसेना आदि हथियार बनाने की फैक्ट्रियां नहीं चलाते है, इसीलिए मीडिया खड़ा नहीं पर पाए। मीडिया पर कंट्रोल लेने की पहली शर्त यह है कि आपके पास हथियार बनाने के कारखानो पर नियंत्रण होना चाहिए। क्योंकि सिर्फ पैसे से मीडिया पर कंट्रोल आता था तो साबुन और शेम्पू बनाकर पैसा कमाने वाले (अम्बानी-टाटा) लोग भी मीडिया कम्पनियां खोल लेते थे।
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सार की बात यह है कि राजनीति को पूरी तरह से पेड मीडिया के प्रायोजक (हथियार निर्माता) कंट्रोल करते है, और उनका सहयोग लिये बिना आप सरकार में शीर्ष स्तर पर नहीं आ सकते। और यदि आप पेड मीडिया के प्रायोजको का सहयोग लेकर सत्ता में आयेंगे तो आपको उनके एजेंडे पर ही काम करना पड़ेगा।
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और उनका एकनिष्ठ एजेंडा यह है कि — आप हथियार नहीं बनाओगे बल्कि अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कम्पनियों के हथियार ही खरीदोगे, ताकि वे आपकी सेना को नियंत्रित कर सके !!
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आप उनके एजेंडे से एक इंच भी इधर उधर हुए तो वे आपका प्लग निकाल देंगे, और पेड मीडिया की सहायता से नया नेता इंस्टाल कर देंगे।
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