> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-09-21

Pawan Jury BhilwaraRj

शहरों में यातायात को नियंत्रित करने के अन्य तरीके क्या हो सकते हैं?
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Pawan Jury BhilwaraRj:

[**शहरों में यातायात को नियंत्रित करने के अन्य तरीके क्या हो सकते हैं?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%8B>;)

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*( **टिप्पणी -* ***यह जवाब अन्य तरीको के बारे में नहीं है। ट्रेफिक कम करने के मुख्य तरीको के बारे में है।इस जवाब में 2 खंड है। पहले खंड में ट्रेफिक की समस्या का मूल कारण, और दुसरे खंड में इसका समाधान है। दूसरा खंड महत्त्वपूर्ण है, और आप चाहे तो सीधे दूसरा खंड पढ़ सकते है।* *)*
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जंगल राज बनाने के लिए कोई व्यवस्था कायम नहीं करनी होती। जरखेजी हो तो बारिश आने से घास पात उग आते है, फिर पहले शाकाहारी और बाद में उनका शिकार करने के लिए माँसाहारी जानवर आ जाते है, और सब जानवर मिलकर अपने अपने कायदे से रहना शुरू कर देते है। बस हो गया जंगल।

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आदमी भी प्राकृतिक रूप से जंगल में ही रहता था। लेकिन आदमी ने संतुलन बनाने के लिए समाज में सार्वजानिक बर्ताव के कायदे बनाने शुरू किये और चीजे व्यवस्थित होने लगी। जिन समाजो / देशो ने बेहतर कायदे बनाये वहां बेहतर व्यवस्था कायम हुयी, और जिन देशो ने व्यवस्था नहीं बनायी उनके यहाँ नरक बनता गया। ट्रेफिक की समस्या भी कुछ जंगल की तरह ही है। मतलब यह बिना किसी प्रयास के बढ़ते रहता है और इसे कंट्रोल करने के लिए कुछ कायदे-क़ानून चाहिए। ट्रेफिक का नरक आपको सभी विकासशील / पिछड़े देशो में मिलेगा। और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इन देशो में यह नरक रचती है।

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भारत में धनिकों एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दबाव में हमारे नेताओं ने गेजेट में ऐसे क़ानून छापें है जिसके साइड इफेक्ट के रूप में ट्रेफिक की समस्या और भी तेजी से बढ़ती है, और उन्होंने कुछ ऐसे कानूनों की जान बूझकर अवहेलना की है जिससे ट्रेफिक की समस्या कम होती है।
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## **वजह पैसा है !! दरअसल ट्रेफिक की समस्या कुछ लोगो को पैसा बनाकर देती है !!!**

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मुख्य रूप से दो समूह ऐसे है जिनका मुनाफा ट्रेफिक बढ़ने के अनुपात में बढ़ता है :
* तेल कम्पनियों के मालिक (Rockefeller Family & others)
* जमीन जमाखोर (Land hoarders including Tata , Godrej etc)

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इसके अलावा ऑटो मोबाईल एवं बैंकिंग कंपनियां भी इस समस्या की लाभार्थी है। परन्तु ये आगे चलकर ऐसे क़ानून नहीं छपवाते जिससे विशेष रूप से ट्रेफिक बढ़े।
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**खंड – अ**
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## **गेजेट का इस्तेमाल करके भारत में उन्होंने ये नरक कैसे रचा ?**

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**(1) सड़को को जाया तौर पर वाहनों से पाट देना :**
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1991, तब भारत में 2 करोड़ वाहन थे। तेल कंपनियों के मालिकों ने तेल की खपत 10 गुणा करने के लिए वाहनों की संख्या को 10 गुणा करने का लक्ष्य बनाया। आज भारत में लगभग 25 करोड़ वाहन दौड़ रहे है !! भारत दुनिया का सबसे बड़ा वाहन उत्पादक देश है और यह इंडस्ट्री 2 करोड़ वाहन प्रति वर्ष बाजार में फेंक रही है। तो तेल कम्पनियों को ट्रेफिक बढ़ाने में रुचि नहीं थी, लेकिन वे भारत के हर आदमी की जांघो के निचे इंजन देखना चाहते है। और इस चक्कर में यदि ट्रेफिक बढ़ता है तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।
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और जब तक प्रत्येक व्यक्ति के पास एक निजी वाहन नहीं होगा तब तक उनकी गाड़ी रुकने वाली नहीं है। पर वे इससे भी आगे बढ़ेंगे और odd-even जैसे क़ानून भी लेकर आयेंगे, ताकि जिनके पास पर्याप्त पैसा हो उन्हें 2-2 गाड़ियाँ थमाई जा सके – एक odd नम्बर की और एक even नम्बर की !!

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*क्या इन 30 वर्षो के दौरान भारत की जनसँख्या 10 गुना हो गयी थी ?
*.

नहीं। भारत की जनसख्याँ वृद्धि दर 20% के आसपास थी। किन्तु वाहनों की वृद्धि दर 10 गुणा यानी कि 1000% रही।
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*क्या भारतीय अचानक इतनी तेजी से समृद्ध हो गए थे ?*

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नहीं। दरअसल उन्होंने भारत के बाजार को वाहनों से पाटने के लिए प्रत्येक मिडिल क्लास घर के प्रत्येक सदस्य को एक वाहन बेचने का लक्ष्य बनाया। और इसके लिए उन्होंने बैंकिंग के कानूनों का इस्तेमाल किया :
* असीमित चेकबुक जारी करना।
* चेक बाउंस को क्रिमिनल ऑफेन्स बनाना।
* वाहन लोन पर 90% फायनेंस।
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**यह एक Debt Trap था।**

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अब यदि आपके पास 25 हजार रूपये भी है तो आप 5 लाख का वाहन खरीद सकते थे। इस तरह चेकबुक के एवज में अंधाधुंध वाहनों की बिक्री शुरू हुयी और ट्रेफिक बढ़ने लगा।

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**प्रचलित गलत तर्क :** चेक आने से व्यापार करना आसान हुआ, और लोगो को नकदी का विनिमय करने का जोखिम उठाने से मुक्ति मिली। यदि चेक की प्रतिष्ठा बनाकर रखनी है तो क्रिमिनल ऑफेंस बनाने में गलत बात क्या है ? और हर आदमी के पास वाहन हो तो इसमें गलत बात क्या है ? इससे विकास होता है, और लोगो की सुविधा में वृद्धि होती है।
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इस प्रकार के तर्कों में संतुलन की अवहेलना कर दी जाती है, और ज्यादातर लोग व्यवस्था पर विचार करने के दौरान यह गलती करते है। व्यवस्थाओं की निस्बत आप ब्लेक एडं व्हाईट स्टेंड नहीं ले सकते। सभी व्यवस्थाएं एक संतुलन बनाने का काम करती है, और वही व्यवस्था टिकेगी जो संतुलन लाती है।
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**1.1. गलत तर्क :** चेक आने से व्यापार करना आसान हुआ, और लोगो को नकदी का विनिमय करने का जोखिम उठाने से मुक्ति मिली। यदि चेक की प्रतिष्ठा बनाकर रखनी है तो क्रिमिनल ऑफेंस बनाने में गलत बात क्या है ?

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उल्लेखनीय है कि अमेरिका में चेकबुक असीमित संख्या में जारी नहीं की जाती और चेक की वैधता अवधि सिर्फ 3 से 6 माह होती है। मतलब जिस दिन बैंक ने आपको चेक जारी किया है जारी करने की तिथि के अगले 90 से 120 दिन में चेक स्वत: ही एक्सपायर हो जाता है।
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अत: आप हद से हद सिर्फ 90 दिन आगे का चेक काट कर दे सकते हो इससे ज्यादा नहीं। और यदि चेक बाउंस भी हो जाता है और चेक भविष्य के वादे पर दिया गया है तो आपको और कोई सजा नहीं होती !! तब केवल आपसे पैसा वसूला जाएगा, लेकिन सजा नही होगी !! अमेरिका में पहले चेक बाउंस होने पर सजा का प्रावधान था। किन्तु वहां पर जूरी सिस्टम होने के कारण चेक बाउंस का मुकदमा जूरी के पास जाता था और जूरी भविष्य का वादा होने पर चेक बाउंस होने पर कोई सजा नहीं करती थी।

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चेक बाउंस पर जूरी मंडल का स्टेंड रहता था कि, किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का कोई भरोसा नहीं होता है, और कोई व्यक्ति यदि भविष्य के वादे पर चेक काटकर देता है तो यह फौजदारी अपराध नहीं है। अत: यदि उसने भविष्य के वादे पर चेक काटकर दे दिया है तो उससे पैसा तो वसूल किया जा सकता है किन्तु उसे जेल नहीं भेजा जा सकता। उसे जेल सिर्फ तब भेजा जा सकता है जब चेक काटते समय व्यक्ति के खाते में पैसा था !! वाहन लोन, होम लोन आदि भविष्य के वादे है।

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और इस तरह गलत क़ानून होने के कारण जूरी मंडलों ने चेक बाउंस के आरोपियों को कभी भी सजा नहीं दी और धीरे धीरे यह क़ानून सिर्फ कागज में रह गया !! भारत में असीमित चेकबुक जारी करने, 90% फायनेंस करने और असीमित अवधि आगे के चेक काटने के कानूनों ने तेजी से वाहन बिक्री का रास्ता साफ़ किया।

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इस क़ानून ने जरूरतमंद लोगो को सूदखोरों के पंजे में फंसने की और भी धकेला और इस गलत क़ानून का एक अन्य दुष्परिणाम यह है कि आज लाखों लोगो की टाँगे चेक बाउंस के मामलो में अदालत में फंसी हुयी है। और इनमे से ज्यादातर मामले फर्जी है !! और ये लाखों पीड़ित यह बात कभी नहीं जान पायेंगे कि वे जो मुकदमे भुगत रहे है वह एक गलत क़ानून की वजह से है !!

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**1.2. गलत तर्क :** हर आदमी के पास वाहन हो तो इसमें गलत बात क्या है ? इससे विकास होता है, और लोगो की सुविधा में वृद्धि होती है।

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वाहन टीवी की तरह घर पर नहीं रखा जाता, यह बाजार में दौड़ता है। और इस तरह जब आप वाहन खरीदते है तो यह सार्वजनिक परिवहन पर भार बढ़ाता है। यदि परिवहन के ढाँचे एवं पार्किंग में पर्याप्त निवेश किये बिना अंधाधुंध वाहनों को खरीदने की अनुमति दी जाएगी तो वाहन सड़को को पूरी तरह कब्जे में ले लेंगे और अन्य लोगो को परेशानी होनी शुरू हो जायेगी। इसीलिए वाहनों की संख्या को प्रबंधित करने की जरूरत होती है। आपको एक संतुलन बनाना होता है - सड़को का, फुटपाथ का, तेल की खपत आदि का। वर्ना एक आयामी विस्तार करने से असंतुलन पैदा होगा और शेष आयामों से आपको समस्याएं आने लगेगी।
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**(2) उन्होंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट को तोड़ा और तेल की खपत बढाने वाले इनफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दिया :
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पहले चरण में उन्होंने ऐसे क़ानून छापे जिससे हर आदमी के पास गाड़ी पहुंची, और फिर ये सुनिश्चित किया है कि लोग निजी वाहनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करे। वाहन खरीद लेने भर से तेल की खपत नहीं बढती है। तेल की खपत बढ़ाने के लिए ऐसी परिस्थितियां रचना जरुरी है कि आदमी ज्यादा से ज्यादा निजी वाहनों का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य हो :

* पब्लिक ट्रांसपोर्ट को खच्चर बनाना
* शहरो में फुटपाथ नहीं बनाने देना
* छोटे छोटे प्लेटफ़ॉर्म बनाकर अतिक्रमियों को आमंत्रित करना
* लम्बे सफर को आसान बनाना
* सड़को पर कुत्तो और गायों की भीड़ बढ़ाना

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**2.1. पब्लिक ट्रांसपोर्ट : **उन्होंने ऐसे क़ानून छापने की निरंतर अवहेलना की जिससे पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहतर बने। यदि पब्लिक ट्रांसपोर्ट बढेगा तो निजी वाहनों का उपयोग कम होगा और तेल की खपत कम होगी। आप जिस भी शहर में रहते है उसमे इसे आजमा सकते है। यदि आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करेंगे तो भूत बनकर घर आयेंगे। अख़बार और बुद्धिजीवियों के कॉलम भकोसने वाले लोगो को लग सकता है कि ऐसा बढती हुई जनसँख्या एवं जगह की कमी के कारण है। पर यह बकवास तर्क है। एक वातानुकुलित बस आरामदायक स्थिति में भी 50 सवारियों को ढो लेती है। निजी वाहन इस्तेमाल करने वाले 50 लोग यदि Low Flore वातानुकुलित बस का इस्तेमाल करते है तो रोड़ पर से 50 वाहनों की भीड़ कम हो जायेगी। रोड़ से भी और पार्किंग स्लॉट से भी !!

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और शहर में ऐसे कई लोग होते है या उनका काम इस ढंग का होता है कि वे कई बार पब्लिक ट्रांसपोर्ट का विकल्प होने पर निजी वाहन का इस्तेमाल नहीं करेंगे। किन्तु उन्हें निजी वाहनों का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य करने के लिए सरकारे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का विकल्प क्षीण कर देती है या फिर इसे इस ढंग का बना देती है कि आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल सिर्फ तक करेंगे जब आपको पास और कोई विकल्प ही न रहे।

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लेकिन पब्लिक ट्रासपोर्ट को तोड़ने और निजी वाहनों को बढ़ावा देने के कई क़ानून छापने के कारण सड़को पर ज्यादा वाहन दौड़ने लगे। यहाँ तक कि निजी वाहनों को बढ़ावा देने के लिए मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह ने रोड़वेज को बंद ही कर दिया था। और फिर शिवराज सिंह जब सत्ता में आये तो उन्होंने भी इसे फिर से शुरू करने से इनकार कर दिया !!

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इसी क्रम में ट्रेनों की बेंड बजाना भी शामिल है, ताकि एक तरफ ज्यादा से ज्यादा नागरिको को निजी वाहनो में यात्रा करने के लिए धकेला जा सके और बाद में भारतीय रेल विदेशियों को बेची जा सके। यदि ट्रेने सुधार दी जायेगी तो इन्हें बेचने पर नागरिक सड़को पर उतर आयेंगे और उन्हें फैसला पलटना पड़ेगा। तो पहले ऐसे क़ानून छापो जिससे ट्रेने बदतर बने और बाद में बदतर होने का हवाला देकर घूस खाकर इन्हें विदेशियों के हवाले कर दो !! ट्रेन एक पूरा अलग विषय है, इसीलिए इस बारे में फिर किसी जवाब में अलग से लिखा जाएगा।

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2.2. फुटपाथ तोडना:**

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अमेरिका के शहरो में लगभग 95% सड़को के साथ फुटपाथ है। जबकि भारत के शहरो में फुटपाथ का प्रतिशत 5% से भी कम है !! क्या फुटपाथ बनाने के लिए किसी तकनीक की जरूरत होती है ? या इनके पास पैसे या जमीन नहीं है ?

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अगर आप ध्यान दें तो पायेंगे कि ज्यादातर क्षेत्र में फुटपाथ के लिए जगह खाली पड़ी है, किन्तु नगर निगम / परिषद इन पर फुटपाथ नहीं बनाते। वे इस जगह को खाली छोड़ देते है, ताकि लॉरी-ठेले-केबिन लगाने वाले इस खाली पड़ी जमीन पर अपना कारोबार लगाना शुरू कर दें !!

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अखबार और बुद्धिजीवियों की किताबें चाटने वाले समझदार लोग आपको बताएँगे कि भारत के लोगो में अनुशासन नहीं है, वे अशिक्षित है, उनमे राष्ट्र प्रेम नहीं है, शउर नहीं है, और इसीलिए वे अतिक्रमण कर लेते है। और मैं इन समझदार लोगो से कहता हूँ – कि तुम अपनी समझदारी के साथ दफा हो जाओ। ये ज्यादा पढ़े लिखे लोग सरकार को कवर देने और भारतीयों का तिरस्कार करने के लिए इस तरह की बातें कहते है।

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दरअसल सरकार तेल कंपनियों के दबाव में फुटपाथो का इनफ्रास्ट्रक्चर खड़ा नहीं करना चाहती, और इसीलिए वह ज्यादातर जमीन को खाली छोड़ देती है, और सांकेतिक रूप से बीच बीच में छोटे छोटे *प्लेटफोर्म* बना देती है। और सिर्फ इस वजह से अतिक्रमण करने वाले प्रोत्साहित होते है।

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2.2.1. फुटपाथ और प्लेटफ़ॉर्म में क्या फर्क है ?**

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फुटपाथ निरंतर जबकि प्लेटफ़ॉर्म टुकड़ो में होता है। 100-200 फुट के टुकड़े को प्लेटफ़ॉर्म कहते है, इसे फुटपाथ नहीं कहते। फुटपाथ सड़को के साथ निरंतर होता है, जितनी लम्बी सड़क होगी उतना ही लम्बा फुटपाथ होगा। उसमे कोई व्यवधान नहीं आएगा। जहाँ पर क्रोसिंग आएगी वहां पर पैदल पार पथ होगा और फिर से सडक के साथ फुटपाथ शुरू हो जायेगा। फुटपाथ के इन्फ्रास्ट्रक्चर का मतलब है कि शहरो में जहाँ जहाँ भी डामर बिछा हुआ है, वहां वहां अनिवार्य रूप से फुटपाथ होता है। यदि फुटपाथ निरंतर होगा तो लोग इनका इस्तेमाल पैदल चलने में करने लगेंगे और इस पर कभी भी अतिक्रमण नहीं होगा। मैंने भारत में ऐसी दर्जनों कोलोनियाँ देखी है जहाँ पर कई किलोमीटर के निरंतर फुटपाथ है, और इस वजह से वहां पर कभी कोई अपनी केबिन-ठेला वगेरह नहीं रखता।

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2.2.2. तो तेल कम्पनियों की नीति क्या है ?**

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उनकी नीति है कि शहरो में ज्यादा से ज्यादा प्लेटफ़ॉर्म के बेतरबीब टुकड़े बनाए जाए। वे इन बेतरबीब टुकडो की लम्बाई कम रखते है, ताकि लोग इनका इस्तेमाल पैदल चलने में न कर सके। यदि आप इन पर चलेंगे तो आपको बार बार रोड़ पर उतरना पड़ेगा और अंत में आप फुटपाथ छोड़ देंगे। और चूंकि लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे है, अत: जल्दी ही Street Vendors इन प्लेटफ़ॉर्म पर कब्ज़ा कर लेंगे।

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ये वेंडर्स रोड़ के एकदम किनारे पर खड़े होते है, अत: इनके ग्राहक रोड़ पर खड़े रहते है, और इस तरह 100 फिट रोड़ में से 20-20 फुट रोड़ दोनों तरफ से गायब हो जाती है, और रोड़ की वास्तविक चौड़ाई 60 फिट रह जाती है। इसी 60 फिट में से वाहनो को भी निकलना है, वेंडर्स के ग्राहकों को रोड़ के किनारे खड़ा रहना है, और इन ग्राहकों को अपने वाहन भी यही खड़े करने है, और इसी सब के बीच में से पैदल जाने वाले यात्रियों को भी निकलना है। और फिर वे ऐसे क़ानून भी छापते है जिससे रोड़ पर आवारा गायों और कुत्तो की संख्या निरंतर बढती जाए !!

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और फिर पुलिस कर्मियों को निर्देश दिए जाते है कि वे इन्हें हटाए नहीं। तो पुलिस वाले इनसे हफ्ता वसूलना शुरू कर देते है। और कोई सभापति यदि फुटपाथ का इनफ्रास्ट्रक्चर सुधारेगा तो सीएम उसे नौकरी से निकाल देगा।
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> *दरअसल सभापति का काम शहर के ट्रेफिक को बदतर से बदतर बनाए रखना और साथ ही ऐसे नाटकीय फैसले लेने का ढोंग करते रहना जिससे ऐसा लगे कि कुछ किया जा रहा है !!*
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**मतलब आप जो नरक झेल रहे है, उसे उन्होंने जानबूझकर रचा गया है !! और यह काफी इंटेलिजेंट डिजाइन है !!**

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उन्होंने पैदल चलने वालो के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। पूरे शहर में डामर बिछा हुआ है, और डामर का मतलब है उस पर पहला राईट वाहन का है। तो शहरो में सिर्फ डामर है, डामर के किनारे कच्ची जमीन है या फिर प्लेटफ़ॉर्म है। लेकिन फुटपाथ नहीं है। फुटपाथ बिलकुल भी नहीं है। यदि आप पैदल निकलेंगे तो जान जायेंगे कि भारत में पैदल चलने वालो के लिए कोई जगह नहीं है। उन्हें उसी डामर पर चलना होता है, जिस पर वाहन दौड़ते है।

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और जब भी आप डामर पर चलते है तब वाहन के रूट का अतिक्रमण कर रहे होते है। तो वे आपको हॉर्न देते है, आपको साइड में चलने को कहते है, कभी आपको टल्ला मारकर या छू कर निकलते है, और आपको पैदल चलते हुए बार बार पीछे मुड़कर देखना पड़ता है। जाहिर है आप इससे असुरक्षित महसूस करेंगे और वाहन लेकर निकलेंगे। मतलब सरकार की policy है कि यदि आपको घर से निकलना है तो वाहन लेकर ही निकलो, वर्ना न निकलो !!

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फुटपाथ पर चलने से व्यक्ति सुरक्षित महसूस करता है, और उसकी पैदल चलने की हैबिट बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए कोलकाता के Salt Lake में लगभग 90% फुटपाथ है। और इलाका भी काफी बड़ा है। लगभग 5-7 किलोमीटर में फैला हुआ। मैं वहां लगभग 2 साल रहा और इस दौरान मैं ज्यादातर पैदल ही आता जाता था। और मेरे अलावा अन्य लोग भी 2-3 किलोमीटर तक का फासला होने पर फुटपाथ का प्रयोग ही करते थे। तो मेरा यह व्यवहारिक अनुभव है कि जहाँ फुटपाथ का इन्फ्रास्ट्रक्चर है, वहां लोग छोटी दूरी तय करने में वाहनों का इस्तेमाल बेहद कम करते है। और इससे तेल की खपत कम होने लगती है !!

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**2.3. पार्किंग :**
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जो दशा फुटपाथ की है वही दशा पार्किंग की है। इसे अच्छे से समझने के लिए आप अपने शहर के नगर परिषद कार्यालय में जाइए और वहां से यह आंकड़े मांगिये कि पिछले 15 वर्षो में मुनिसिपल्टी ने कितनी भूमि पर सार्वजनिक पार्किंग बनायी है, और पार्किंग की समस्या को हल करने के लिए व्यवसायिक कोम्प्लेक्स / दुकाने आदि का निर्माण करने पर पार्किंग प्लेस का प्रतिशत तय करने के लिए कितने क़ानून छापें है, और उनमे से कितनो का पालन हुआ है। और फिर आप अपने जिले के RTO कार्यालय से यह डेटा ले सकते है कि पिछले 15 वर्षो में कितने नए वाहनों का पंजीयन हुआ है !!

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और तब आपको मालूम होगा कि पार्किंग प्लेस उतना ही है जितना 15 साल पहले था, लेकिन वाहनो की संख्या 20 गुना बढ़ चुकी है। प्रत्येक वाहन 6 फुट चौड़ा और 7 फुट लम्बा स्पेस लेता है। उन्होंने सड़को पर ये वाहन फेंक दिए किन्तु इन्हें खड़े करने के लिए पार्किंग के कोई क़ानून जानबुझकर नहीं छापे। नतीजा , सड़को के किनारे लगातार आप खड़े वाहनों की कतार देखेंगे, और इसकी वजह से सड़को की चौड़ाई अस्थायी रूप से और भी घट जाती है।

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इस वजह से ट्रेफिक और भी बढ़ता है। और ट्रेफिक जितना बढेगा, वाहन उतने धीरे चलेंगे या रेंगने लगेंगे और इससे तेल की खपत बढ़ जाती है !!

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**2.4. लम्बे सफर को आसान बनाना :**
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उन्होंने वाजपेयी के शासन के दौरान फोर लेन-सिक्स लेन आदि बनाने के प्रोजेक्ट मंजूर करवाए थे। इन सभी प्रोजेक्ट्स के ठेके भी विदेशियों के दिए गए। हालांकि हाई वे बनाने को लेकर मेरा विरोध नहीं है। और मेरा मानना है कि हमें लम्बी दूरी तय करने के लिए हाई वे बनाने की जरूरत है, ताकि ट्रांसपोर्टेशन की लागत कम हो।

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किन्तु मेरा बिंदु यह है कि उन्होंने सारा निवेश सिर्फ लम्बे सफर को आसान बनाने के लिए किया और शहरो में यातायात सुधारने के क़ानून छापने की जान बुझकर अवहेलना की।

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इसकी वजह से दोनों और से तेल की खपत बढ़ी। वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण शहरो में ट्रेफिक बढ़ गया जिससे तेल की खपत बढ़ी और हाई वे बेहतर होने के कारण ज्यादा से ज्यादा वाहन धारी लम्बी दूरी तय करने के लिए निजी वाहनों का इस्तेमाल करने लगे। और इससे भी तेल की खपत बढ़ी।

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मिसाल के लिए मेरा उदारहण देखिये – मैंने 2007 में एल्टो खरीदी थी। मैंने इसके लिए 3,30,000 का भुगतान किया और इस कार को अगले 10 महीने में 90 हजार किलोमीटर चला लिया था। जब 2008 में मैंने इसका हिसाब निकाला तो मालूम हुआ कि मैं सिर्फ 1 वर्ष के भीतर 4 लाख रू का पेट्रोल फूंक चुका था !! मतलब मैंने वाहन खरीदने के लिए 3,30,000 रू का भुगतान किया था लेकिन तेल कम्पनियों को 4 लाख दे दिए थे !! और सरकार इस तेल के बदले में डॉलर भी चुका रही थी !!

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2008 में मैंने फिएस्टा ली और अगले 1 वर्ष में मैंने फिर से तेल कम्पनियों को 3 लाख चुकाए !! मतलब सिर्फ एक कार ने सरकार पर 7 लाख रूपये के डॉलर चुकाने का भार बढ़ा दिया था !! और 2011 के बाद से मैंने जब भी वाहन का इस्तेमाल किया है तब ज्यादातर बार मुझे ऐसा इसीलिए करना पड़ा क्योंकि तेल कम्पनियों ने भारत में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को नारकीय बनाकर रखा हुआ है। तो मेरे पास निजी वाहन इस्तेमाल करने के सिवा कोई विकल्प नही था !!

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**2.5. सड़को पर आवारा कुत्तो एवं गायों की संख्या बढ़ाना :**
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1. **कुत्ते :** वाजपेयी ने 2001 में सड़को पर कुत्तो की आबादी बढ़ाने के लिए क़ानून छापा था। इस क़ानून ने कुत्तो को पकड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया, और तब से कुत्ते बढ़ते जा रहे है, और इनकी संख्या लगातार बढती जायेगी !! इसके बाद जितने भी पीएम आये उनमे से किसी ने भी इस क़ानून को ख़त्म नहीं किया। कुत्तो की समस्या से दिल्ली वाले ढंग से वाकिफ है, और सबसे नजदीक से उन्ही पर ये मार पड़ रही है। कुत्तो की संख्या बढ़ने से एक तरफ तो रात को आदमी असुरक्षित महसूस करते है, और वाहन लेकर ही निकलते है, और दिन में ये ट्रेफिक में व्यवधान डालते है। इसमें एक दूसरी वजह भी है -- सरकारें आवारा कुत्तो की संख्या इसीलिए भी बढ़ाती है ताकि रात्री कालीन गेदरिंग को तोड़ा जा सके।
1. **गायें :** गायों को सड़को पर धकेलने के पीछे कई सारे कारण है। मैंने इस विषय पर अलग से एक जवाब में लिखा है। इसमें एक वजह सड़को पर ट्रेफिक भी बढ़ाना है। आप जिस भी शहर में रहते है, कल सुबह वाहन लेकर निकलिए और 2-5 किलोमीटर की राइड में सड़को पर घूमती / पसरी आवारा गायों की संख्या गिनिये। आपको अंदाजा हो जाएगा कि आवारा गायें किस तरह ट्रेफिक को बढ़ाती है।

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**खंड – ब**
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**समस्या का मूल कारण और सार -
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1. उन्होंने जानबूझकर शहरो में इस तरह का इन्फ्रास्त्रक्चर खड़ा किया है कि पैदल, साईकिल, दुपहिया, चार पहिया, गायें, कुत्ते, बसें, ट्रक, सभी एक ही रोड़ का इस्तेमाल करें।
1. और साथ ही उन्होंने जानबूझकर यह व्यवस्था की बनायी है कि इस रोड़ पर स्ट्रीट वेंडर्स यदि अपनी जगह बना लेते है तो उन्हें कोई हटा नहीं सके।
1. और उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया है कि पार्किंग भी इसी रोड़ पर हो !!
1. और साथ ही उन्होंने देश में भर बुद्धिजीवियों को भी यह तर्क देने के लिए तैयार किया है कि इस पूरी अव्यवस्था के जिम्मेदार खुद भारतीय है !!

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**समाधान :**

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**(1) छद्म समाधान : **फर्जी समाधान की पहचान है कि उन्हें लागू नहीं किया जा सकता। फर्जी समाधान में नारे , डायलॉग, दर्शन , उपदेश , सलाह, प्रवचन, बौद्धिकता और जागरूकता फैलाने के टोटके होते है, और अंत में इसमें यह कतगा जरुर लगाया जाता है कि भारत के लोग ही जाहिल, अशिक्षित, बे-शउर, अनुशासन हीन, स्वार्थी है और इसीलिए सभी प्रकार की व्यवस्थागत दुर्दशा के लिए जिम्मेदार खुद भारतीय है।

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इस तरह का वैचारिक प्रदुषण फैलाने का धंधा टीवी-अखबार में आने वाले सभी बुद्धिजीवी करते है। और जो लोग इन बुद्धिजीवियों की चपेट में रहते है वे भी यथाशक्ति आपको सोशल मीडिया पर इसी तरह का बौद्धिक ज्ञान बाँटते हुए मिल जायेंगे। दरअसल इन्हें समाधान नहीं देना होता है, बल्कि बहस करके लोगो का टाइम बर्बाद करना होता है, ताकि उन्हें सही समाधान से दूर धकेला जा सके। और इसीलिए इनके समाधान में गेजेट / क़ानून लफ्ज का प्रयोग नहीं होता। और भारतीयों का इस तरह तिरस्कार करने से इन्हें एक मानसिक संतुष्टि मिलती है। भारतीयों को कोस कर ये खुद में ज्यादा समझदार और बुद्धिजीवी होने का उच्च भाव बनाए रखते है।

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**(2) स्थिति को और भी बदतर बनाने वाले समाधान : **सरकार इसका जो भी समाधान लाएगी वह समस्या को और भी बदतर बनाएगा। इसका कोई अपवाद नहीं है। सरकार एवं नेताओं का काम ही है समस्याओ को बदतर बनाना है। चाहे odd-even हो या नए ट्रेफिक रूल्स हो। सरकार और नेता कोई भी हो उनसे आप सिर्फ बदतर की उम्मीद ही रख सकते है। यह बात और है कि आपको इसका नतीजा समझने में 10-20 साल लगेंगे। तो यदि आपको इसका समाधान चाहिए तो मेरा सुझाव है कि कम से कम टीवी पर नजर आने वाले तमाम नेताओं से इस मामले में उम्मीद न पालें। वे सभी अभिनेता है और उनके प्रयोजको द्वारा दी गयी स्क्रिप्ट पर अपना अपना पार्ट अदा कर रहे है। जो भी आपको फर्क नजर आता है, वह नेता की अभिनय क्षमता का है।
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**(3) वास्तविक समाधान :** वास्तविक समाधान गेजेट से आते है। निचे मैंने कुछ इबारतें और कुछ क़ानून ड्राफ्ट्स के बारे में जानकारी दी है, जिन्हें गेजेट में निकालने से बदलाव आएगा :

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3.1. नए वाहनों की बिक्री कम करना :**

1. सरकारी बैंक वाहनों की खरीद के लिए कोलेटरल फ्री लोन नहीं देंगे। व्यावसायिक लदान में काम आने वाले वाहनों के लिए 50% तक का फायनेंस मोर्गेज प्रोपर्टी पर किया जा सकेगा, किन्तु निजी एवं सवारी वाहनों के लिए 0% फायनेंस होगा !!
1. निजी बैंक अपने जोखिम पर वाहनों के लिए लोन दे सकते है। किन्तु किश्त बाउंस होने पर क्रिमिनल ऑफेंस नहीं होगा।
1. चेक बाउंस के सभी मामलों की सुनवाई नागरिको की जूरी करेगी।
1. बैंक सिर्फ 90 से 120 दिन की वेलिडिटी के चेक जारी करेंगे।
1. सभी प्रकार के आयातित वाहनों पर 100% इम्पोर्ट ड्यूटी। जिसे भी विदेशी वाहन खरीदना है वह दुगने दाम चुका सकता है।

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**3.2. पब्लिक ट्रांसपोर्ट इम्प्रूव करना : **पब्लिक ट्रांसपोर्ट इम्प्रूव करने के लिए कई सारे गेजेट नोटिफिकेशन छापने की जरूरत है। इसमें रेल से लेकर सड़क परिवहन तक सब शामिल है। फिलहाल सरकार की नीति है कि सरकारी परिवहन को खच्चर बनाओ और घाटे / बदहाली का हवाला देकर परिवहन का क्षेत्र विदेशियों को बेच दो। और एक बार जब विदेशी परिवहन पर एकाधिकार बना लेंगे तो वो पब्लिक को सूतना शुरू कर देंगे।

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यदि रेल मंत्री और सड़क परिवहन मंत्री को वोट वापसी और जूरी के दायरे लाया जाए तो वे अपने आप पब्लिक ट्रासंपोर्ट को सुधारने के लिए नीतियाँ बनाना शुरू कर देंगे। यदि फिर भी वे इसमें सुधार नहीं लाते है तो जनता अमुक मंत्री को लात मार कर**(*)** नौकरी से निकाल सकती है। वोट वापसी एवं जूरी कोर्ट के आये बिना इस पार्टी का मंत्री रहे या उस पार्टी का, हर हाल में वे पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बैंड बजाना जारी रखेंगे।
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***(*) **वोट वापसी को लात मारकर बाहर निकालने का अधिकार कह कर पुकारने की खोज मैंने नहीं की है। इस टर्म का सुझाव सबसे पहले मोदी साहेब ने दिया था। और मुझे काफी हद तक यह टर्म ठीक लगी। तो कृपया इसमें भाषाई असभ्यता न खोजें। हालांकि मोदी साहेब ने इस अधिकार का सिर्फ मौखिक समर्थन किया लेकिन लात मारने का अधिकार देने के लिए कभी नोटिफिकेशन नही निकाला !!
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3.3. फुटपाथ एवं पार्किंग :** शहरो का प्रशासन सभापति के हाथ में है। अभी सभापति काफी मुख्तलिफ कार्यो में व्यस्त रहता है। उसे ठेके देकर पैसे बनाने होते है, अपने आदमियों को प्रशासन में फिट करना होता है ताकि उनके माध्यम से पैसा खींचा जा सके, सीएम और पार्टी के आला अधिकारियों की चमचई करनी होती है, ताकि अगला टिकेट पक्का करके अपने राजनैतिक भविष्य को सुरक्षित रखा जा सके। और सबसे जरुरी काम उसे यह करना होता है कि जो अवैध पैसा वो बना रहा है, उसे व्हाईट करके ठिकाने लगाना होता है। तो इन सब जरुरी कामो में सभापति का दिमाग इतना व्यस्त रहता है, कि उसे फुटपाथ ट्रेफिक आदि जैसे चिल्लर मुद्दों पर सोचने का टाइम ही नहीं मिलता।
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मेरा प्रस्ताव है सभापति को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने का है। इस क़ानून के आने के अगले दिन से ही सभापति निम्नलिखित कदम उठाना शुरु कर देगा ;
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1. वो शहर में सभी प्रकार के अतिक्रमण हटाएगा और स्ट्रीट वेंडर्स के लिए चौपाटियां बनाकर उन्हें एलोट करेगा।
1. यथासंभव सड़को के साथ निरंतर फुटपाथ बनाएगा और यह भी सुनिश्चित करेगा कि इन फुटपाथ पर अतिक्रमण 24 घंटे से ज्यादा टिके नहीं।
1. वह सार्वजनिक पाकिंग बनाना शुरू करेगा, और व्यस्त इलाको के हिसाब से प्रति घंटा के हिसाब से पार्किंग दरें निर्धारित करेगा।
1. सभापति सभी पार्किंग प्लेस को पीले रंग एवं फुटपाथ को लाल रंग की बोर्डर से चिन्हित करेगा ताकि यह बात एकदम स्पष्ट रूप से निकलकर आये कि अमुक स्थान फुटपाथ या पार्किंग के लिए आरक्षित है। (*)
1. सभापति शहरो के व्यस्त रूट्स पर लो फ्लोर वातानुकूलित एवं सामान्य बसों का “पर्याप्त” नेटवर्क खड़ा करेगा, ताकि जो व्यक्ति पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना चाहते है वे प्रोत्साहित हो।
1. सभापति अपने शहर में नए वाहनों की बिक्री पर पार्किंग / ट्रेफिक टेक्स लेना शुरू करेगा। यह टेक्स वाहन के आकार के आधार पर होगा, कीमत के आधार पर नहीं। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति 4 सीटर पासिंग कार लेता है तो उसे 5,000 रू अतिरिक्त चुकाने होंगे और दुपहिया पर 2,000. इस पैसे का इस्तेमाल सार्वजनिक पार्किंग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट डेवलप करने में किया जाएगा।
1. सभापति प्रत्येक वर्ष में नए वाहनो की बिक्री सीमा भी निर्धारित कर सकता है। यह अनुपात इस आधार पर निर्धारित किया जायेगा कि शहर का इन्फ्रास्त्रक्चर कितने नए वाहनों को झेलने में सक्षम है।

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मैं पिछले 20 साल से राजनीती को देख रहा हूँ, और जितना मुझे अनुभव है मेरा यह पक्के तौर पर मानना है कि पूरा शहर चमगादड़ की तरह उल्टा भी लटक जाए तो किसी भी सभापति को ऊपर दिए गए कदम उठाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसकी चाबी सिर्फ वोट वापसी पासबुक और जूरी कोर्ट है। मैंने इसके लिए जूरी पंचायत नामक क़ानून ड्राफ्ट का प्रस्ताव किया है। इस क़ानून के आने के अगले दिन से ही सभापति शहर का प्रबंधन वैसे ही करने लगेगा जैसे वह अपने घर का प्रबंधन करता है।

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**सरकार के पास इसका एक बदतर समाधान है - **उनकी योजना भारत के सभी बड़े शहरो को विदेशियों के हाथो बेचने की है। वे इसके लिए इस पर स्मार्ट सिटी या इसी टाइप के नारे चिपकाकर जनता को कन्विंस करेंगे और फिर कुछ स्मार्ट शहर की तस्वीरें दिखाकर एक के बाद एक शहरो का प्रबंधन विदेशियों को देते जायेंगे। और जब भी ये किसी विदेशी कम्पनी को प्रोजेक्ट देते है, बदले में नेताओं के स्विस एकाउंट में डॉलर बढ़ते जाते है।

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मैं उनके इस समाधान के खिलाफ हूँ। क्योंकि इससे हम पर डॉलर का बोझ बढ़ता है, और डॉलर का यह बोझ निरंतर बढ़ता है। क्योंकि मेंटेनेंस के लिए हमें हर महीने डॉलर चुकाने होंगे। भ्रष्ट एवं निकम्मे नेता इसी तरह की स्मार्ट तकनीको का इस्तेमाल करते है, क्योंकि एक तरफ तो उन्हें पैसा बनाना होता है, और दूसरी तरफ वे निकम्मे होते है।

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उनकी स्कीम है कि --- हमारे शहरो को साफ़ सुथरा रखने का काम भी विदेशी करें। उनसे पैसा खाओ और उन्हें ऊँचे दामो पर प्रबंधन का ठेका पकड़ा दो। हमें काम करने की जरूरत क्या है !! और इससे डॉलर का बोझ बढ़ता है तो बढने दो, हमें कौनसा जेब से देना है। जब कमी होगी तब देश की कोई न कोई कोल माइंस या खनिज या और कोई जमीन संपत्ति बेचकर उन्हें डॉलर चुका देंगे !!
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