> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-09-07

Pawan Jury BhilwaraRj

इसरो की रिसर्च और उपग्रह प्रोजेक्ट्स ने भारत की मिसाइलो की जमीन तैयार की है -
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<https://www.facebook.com/groups/860298764343202/permalink/916131638759914/>;

Pawan Jury BhilwaraRj:

## [**विश्व स्तरीय अंतरिक्ष और मिसाइल प्रोग्राम होने के बावजूद भी भारत तेजस के लिए जेट इंजन क्यों नहीं बना पाया?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%94%E0%A4%B0>;)

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यह एक कीमती सवाल है, और पेड मीडिया द्वारा भारत में इसका गलत जवाब बहुत बड़े पैमाने पर फैलाया गया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक इस तरह के महत्तवपूर्ण सवालों के गलत जवाब फैलाने में काफी निवेश करते है। यदि इसका सही जवाब लोगो तक पहुंचेगा तो भारत के स्वदेशी हथियारों का निर्माण करने की क्षमता जुटाने की सम्भावना बढ़ जायेगी। और यदि भारत हथियारों के निर्माण में आत्मनिर्भरता हासिल कर लेता है तो **हथियार निर्माता** कम्पनियां भारत नाम का अपना ग्राहक खो देगी।
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तो पेड मीडियाकर्मी, पेड बुद्धिजीवी और अखबारों-टीवी में आकर डायलॉग मारने वाले ज्ञानी पिछले कई दशको से इस प्रश्न के गलत जवाब फैला रहे है, ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के भारत में आने का रास्ता साफ़ करने के लिए माहौल बनाया जा सके। सही जवाब के साथ ही इस उत्तर में उन 3 कानूनों के बारे में भी बताया गया है जिन्हें गेजेट में छापने से भारत फाइटर प्लेन का इंजन बनाने की क्षमता जुटा सकता है।
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यह उत्तर निम्नलिखित प्रश्नों के जवाब भी देता है :
* भारत चंद्रयान बना देता है लेकिन टैंक का इंजन क्यों नहीं बना पाता ?
* भारत ने मंगल मिशन भेज दिया लेकिन एक काम में आने वाली रायफल क्यों नही बना सका ?
* भारत रेल के इंजन, सोनोग्राफी / एमआरआई / X-ray मशीने / कम्पुटर / मोबाईल क्यों नहीं बना पाता ?

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विश्व स्तरीय अंतरिक्ष और मिसाइल प्रोग्राम होने के बावजूद भी भारत तेजस के लिए जेट इंजन क्यों नहीं बना पाया ?
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इस प्रश्न में कई सवाल आपस में गुंथे हुए है, और यह आवश्यक है कि सही जवाब पाने के लिए इन्हें अलग अलग करके उत्तरित किया जाए। पहले मैं इस सवाल में से मिसाईल प्रोग्राम को निकाल देता हूँ। भारत मिसाईल बनाने में कैसे सफल हो गया इसकी वजह मैं अगले खंड में बताऊंगा।
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अब हमारे सामने पहला सवाल है कि -

**(1) भारत अन्तरिक्ष प्रोग्राम में इतना सफल होने के बावजूद तेजस का इंजन क्यों नहीं बना पाया ?**

तकनीकी वस्तुओ की 2 श्रेणियां है।
* ऐसे मिशन जिन्हें बंद इमारतों यानी लैब आदि में चलाया जा जा सकता है।
* ऐसे प्रोजेक्ट जिनमे खुले बाजार की जरूरत होती है।

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पहली श्रेणी में वे वस्तुएं आती है जिनका अविष्कार / विकास / उत्पादन एक बंद इमारत में 50-100 लोगो की प्रतिभाशाली टीम द्वारा किया जा सकता है। इन वस्तुओं का आविष्कार एवं विकास करना अपेक्षाकृत आसान है। इसके लिए आप देश भर में से 1000-500 प्रतिभाशाली इंजीनियरों का चयन करिए और उन्हें सभी सुविधाओ से युक्त लेब दे दीजिये। ये सभी वैज्ञानिक समर्पित होते है, इनमे अनुशासन का स्तर उच्च होता है, इन्हें आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा मुहैया होती है, और इस वजह से ये अपना 100% अपने काम में लगाते है।

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1.1. अन्तरिक्ष प्रोग्राम लेब में चलाया जा सकता है !!
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अन्तरिक्ष प्रोग्राम इसी श्रेणी की तकनीक है। तो यदि सरकार अन्तरिक्ष प्रोग्राम चलाना चाहती है इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर सकती है। परमाणु कार्यक्रम भी इसी श्रेणी की तकनीक है। अत: इसमें भी यह मॉडल सफलतापूर्वक काम करेगा।

इस मॉडल का नुकसान :
* इस मॉडल में एकाधिकार होने के कारण प्रतियोगिता नही होती।
* सारा ज्ञान 500-1000 व्यक्तियों एवं 1-2 संस्थाओ में केंद्रीकृत रहता है।

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परमाणु कार्यक्रम तो सिर्फ सरकार द्वारा ही चलाये जाने चाहिए किन्तु यदि प्राइवेट कम्पनीयों को अन्तरिक्ष कार्यक्रम चलाने की अनुमति दी जाए तो वे ज्यादा बेहतर नतीजे देंगे। इससे दो तरह के फायदे होंगे
1. सरकारी सेट अप को प्रतियोगिता का सामना नहीं करना पड़ता। अत: उनकी लागत ज्यादा होती है। निजी कम्पनी का मूल उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है, और वे लागत कम करने में काफी दिमाग भिड़ाते है। इस वजह से प्राइवेट कम्पनी कम लागत में ज्यादा तेजी से तकनिकी अविष्कार कर लेगी।

उदाहरण के लिए - यदि किसी सरकारी कम्पनी को कोई पुर्जा चाहिए और इसकी कीमत 1000 रू है तो वे इसे बिना दाएं बाएँ देखें खरीद लेंगे। लेकिन निजी कम्पनी इसे 700 रू में खरीदने की कोशिश में सभी विकल्प तलाशेगी। सरकारी कम्पनी इस तरह की कोई कोशिश नहीं करती।
1. इस तरह की सरकारी कम्पनियां जिन प्रोजेक्ट पर काम करती है, वह ज्ञान आसानी से नष्ट किया जा सकता है। उदाहरण के लिए मान लीजिये कि किसी देश की कम्पनी X में 500 आला दर्जे के वैज्ञानिक काम करते है और X किसी वस्तु S का उत्पादन करती है। अब यदि कम्पनी X पर मिसाईल दाग दी जाए या उसके शीर्ष 50 वैज्ञानिको की हत्या कर दी जाए तो अमुक देश हमेशा के लिए यह तकनीक खो देगा।

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[ भारत का अन्तरिक्ष कार्यकम सस्ता नहीं है। यह काफी महंगा है। दरअसल इसकी कीमत हमें ISRO ही बताता है। उन्हें सरकार द्वारा यह निर्देश दिए जाते है कि वे इसकी लागत कम करके दिखाए। तो वे काफी सारे खर्चो को अन्य मदों में दिखाते है। इससे राष्ट्र में एक गौरव का भाव बना रहता है कि हमारी नीतियाँ एकदम ठीक है और हम सही दिशा में काम कर रहे है।

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और मैं इस नीति को गलत भी नहीं मानता। कीमत कम करके दिखाने की एक वजह यह भी होती है कि इसरो को अन्य देशो से काम मिले। इससे डॉलर कक आय होती है, और काम मिलने से तकनिकी कुशलता में वृद्धि होती है। अत: अन्तरिक्ष प्रोग्राम जैसा प्रोजेक्ट घाटे में भी मुनाफा ही देता है। यह एक तरह का निवेश है, जो तकनीक के अवसर खोलता है। ]

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1.2. इंजन वगेरह लेब में नहीं बनाए जा सकते, इसका विकास खुले बाजार में होता है !!
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एक इंजन में कई प्रकार की इंजीनियरिंग का इस्तेमाल होता है। और विमान बनाने में तो दुनिया का ऐसा कोई भी विज्ञान / तकनीक नहीं है, जिसका इस्तेमाल न होता हो। और सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लिए निरंतर वातावरणीय परीक्षणों की जरूरत होती है। यदि आप इसे लेब में बनाने जायेंगे तो इसे कभी भी नहीं बनाया जा सकता। यदि आपने इसे बना भी लिया तो यह प्रभावी नहीं होगा। उदाहरण के लिए अमेरिका के लड़ाकू विमान चीन से ज्यादा उन्नत है। वजह यह है कि अमेरिका में रक्षा उपकरणों में निजी क्षेत्र की भागीदारी है।

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भारत में कोई भी निजी कम्पनी विमानों का इंजन बनाने पर काम नहीं करती !! इस वजह से यह एक नियंत्रित कार्यक्रम है। मतलब आपने 100-200 वैज्ञानिको को पकड़ कर उन्हें इस मिशन पर लगाया हुआ है कि वे इंजन बनाकर दें। भारत में वैमानिक इंजीनियरिंग की क्षमता रखने वाले लाखों इंजीनियर्स है किन्तु उनके पास इसके लिए प्रयास करने का कोई अवसर नहीं है।

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1.3. तो क्या भारत विमान का इंजन बनाने में असफल रहा है ?
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नही !! भारत इंजन बनाने में असफल नहीं हुआ है। हद से हद हम यह कह सकते है कि असफल वे 100-200 इंजीनियर हुए है जिन्हें हमने पिछले 45 सालो से जबरदस्ती इंजन बनाने पर लगा कर रखा हुआ है। और मैं इन्हें भी असफल इसीलिए नहीं कहूँगा क्योंकि हमने इन्हें एक गलत मॉडल पर काम करने के लिए बाध्य किया हुआ है। लैब में इंजन !!! लैब में इंजन बना लेना चांस लेने वाली बात है !! इसका सही मेथड है कि इसे खुले बाजार में ही बनाया जा सकता है।

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और ये 100-200 इंजीनियर्स भारत नहीं है !! भारत में ऐसे हजारी इंजीनियर्स है जो सफलतापूर्वक विमान का इंजन बना सकते है। किन्तु भारत में निजी क्षेत्र के लोगो को विमान का इंजन बनाने का प्रयास करने की अनुमति नहीं है !!

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भारत में टाटा, अम्बानी, जिंदल, अडानी, महिंद्रा से लेकर ऑटो मोबाईल एवं तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली सैंकड़ो कम्पनियां है, जो इंजन बनाने का प्रयास कर सकती है। ऐसे हजारो भारतीय निवेशक है जो इंजन बनाने के प्रोजेक्ट पर पैसा लगा सकते है। ऐसे लाखों इंजीनियर्स है, जो इसके लिए कोशिश कर सकते है। लेकिन सरकार ने गेजेट में यह इबारत छापी हुयी है कि -- भारत में कोई भी निजी व्यक्ति विमान का इंजन बनाने पर काम नहीं करेगा !!!

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लेकिन यदि किसी निजी व्यक्ति को इंजन बनाने के प्रोजेक्ट पर काम करना है तो उसे पहले सरकार से लाइसेंस लेना होता है !! लाइसेंस वे कभी देते नहीं है। और लाइसेंस देने से पहले ही कम्पनी के पूरे प्राण पी लेते है। जाहिर है कभी किसी निजी कम्पनी ने इसके लिए प्रयास नहीं किये !!

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दुसरे शब्दों में भारत में इंजन बनाने की कम्पनी खोलना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है !! सिर्फ सरकार ही यह कम्पनी खोल सकती है। इंदिरा गाँधी जी ने 1980 के आस पास यह सोचना शुरु कर दिया था कि हमें इंजन बनाने की दिशा में काम करना चाहिये। लेकिन उन्होंने इसे निजी क्षेत्र के लिए नहीं खोला !! नतीजा - खरबों डॉलर फूंकने के बाद भी हम 45 साल में इंजन नहीं बना पाए। पर चूंकि परमाणु कार्यक्रम लेब में चलाया जा सकता है अत: हम परमाणु तकनीक जुटाने में सफल हो गए !!

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(2) भारत चंद्रयान बना देता है लेकिन टैंक का इंजन क्यों नहीं बना पाता ?
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टैंक से लेकर सेना के इस्तेमाल में काम आने लायक सभी साजो सामान एवं उपकरण हम नहीं बनाते। और जो भी बनाते है वह काम में लाने लायक नहीं बल्कि काम निकालने लायक होती है। और इसकी एक मात्र और एक मात्र वजह यह है कि निजी क्षेत्र को इसे बनाने की अनुमति नहीं दी गयी है।

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अर्जुन टैंक का प्रोजेक्ट भी हमने 1980 के आस पास ही शुरू किया था। इस पर भी खरबों रुपया फूंके गए और कच्चा पक्का इंजन बनाकर परिक्षण भी किया गया। लेकिन अत: में हमें जर्मनी से इंजन लेने पड़े !!

*वजह -* *इंजन लैब में नहीं बनाया जा सकता !!*

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**(3) भारत ने मंगल मिशन भेज दिया लेकिन एक काम में आने वाली रायफल क्यों नही बना सका ?
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इंसास रायफल की भी यही दशा है। हमने सेना को 20 साल तक बाध्य किया कि वह इस कमतर रायफल का इस्तेमाल करें। लेकिन एक सीमा के बाद सेना के 2013 में सेना ने हाथ खड़े कर दिए और अब इंसास को हटाया जा रहा है। हम अब फिर से विदेशी रायफलों पर अपनी सेना चलाने वाले है !!

*वजह -* *रायफल लैब में नहीं बनायी जा सकती !!*

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मेरा बिंदु है कि :

भारत में निजी कम्पनियों एवं व्यक्तियों को टैंक एवं बंदूक या उसके पुर्जे बनाने की अनुमति नहीं है !! —- यह इबारत हमारे नेताओं ने गेजेट में छापी हुयी है !!

और इस वजह से हम रायफल और टैंक के इंजन नहीं बना पा रहे है !!

और ऐसे में आप 500 लोगो को पकड़ कर कहते है कि —

*तुम इंजीनियरिंग की दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार यानी फाइटर प्लेन का इंजन बनाकर दिखाओ !!*

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**अब अगले चरण का प्रश्न है कि -**

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यदि भारत में हथियारों के निर्माण के लिए लाइसेंस का क़ानून ख़त्म करके सिर्फ **रजिस्ट्रेशन अनिवार्य** का क़ानून बना दिया जाए तो क्या निजी कम्पनियां फाइटर प्लेन या टैंक का इंजन बना सकेगी ?

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नहीं !!** **भारत तब भी ये इंजन नहीं बना सकेगा। तब निजी कम्पनियां विदेशो से महत्त्वपूर्ण पुर्जे आयात करेगी और इन्हें असेम्बल करके सरकार को बेच देगी !!

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खुद से वे तब भी नहीं बना पायेंगे !! फायटर प्लेन या आला दर्जे का तकनीकी उत्पादन तब भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि हमने कारखाना मालिको के पांवो में पत्थर बाँध कर रखे है। यदि भारत में तकनिकी उत्पादन करने वाले लोगो के पांवो में पत्थर नहीं बाँध दिए जाते तो हम निचे दिए सवालों का सामना नहीं कर रहे होते :
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**(4) भारत सोनोग्राफी / एमआरआई / X-ray मशीने / कम्पुटर / मोबाईल क्यों नहीं बना पाता ?**
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दरअसल तकनिकी उत्पादन में गुणवत्ता लाने के लिए हमें भारत में ढेर सारी छोटी छोटी उत्पादन इकाइयाँ चाहिए।
* ढेर सारी छोटी इकाईया क्यों ?
* कुछ बड़ी इकाईया क्यों नहीं ?

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क्योंकि कोई भी विशिष्ट उत्पाद कई प्रकार के पार्ट्स को मिलाकर बनाया जाता है। सभी पार्ट्स यदि उच्च गुणवत्ता वाले होंगे तो ही उत्पाद बेहतर बनेगा। एक भी पुर्जा कमतर होने से उत्पाद अपनी गुणवत्ता खो देगा। उदाहरण के लिए एक मोबाईल फोन डिस्प्ले स्क्रीन, बेटरी, माइक्रोफोन, सेमी कंडकटर चिप, स्पीकर आदि जैसे कई पुरजो को जोड़कर बनाया जाता है। डिस्प्ले स्क्रीन बनाने की सैंकड़ो कम्पनियां हो सकती है। उनमे आपसी प्रतिस्पर्धा होने से कोई दो-चार कम्पनी सबसे बेहतर डिस्प्ले बना पायेगी। और यही प्रक्रिया अन्य पुरजो के साथ होगी।

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मोबाइल बनाने वाली कम्पनी इन कम्पनियो से ये पुर्जे खरीदती है, और इन्हें फिट करके एक डिजाइन तैयार करती है। हवाई जहाज से लेकर कारो तक और कंप्यूटर तक इसी तरह प्रोडक्ट तैयार किया जाता है। दुनिया में ऐसी कोई कम्पनी नहीं जो अपने जटिल प्रोडक्ट के सभी पुर्जो का उत्पादन स्वयं करती हो। वह केवल महत्तवपूर्ण एवं जटिल पुर्जो का उत्पादन स्वयं करती है, और शेष पुर्जे अन्य छोटी छोटी कम्पनियों से लेती है।

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यदि वह सभी पार्ट्स का उत्पादन स्वयं करेगी तो उसके अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता गिर जायेगी। अत: किसी देश में एक बड़ी तकनिकी उत्पादक कम्पनी खड़ी करने के लिए यह जरुरी है कि वहां पर छोटी छोटी कई इकाइयों हो जो बेहतर तकनिकी वस्तुओ का उत्पादन करें।

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अमेरिका-फ़्रांस-ब्रिटेन में जूरी सिस्टम होने के कारण वहां पर कारखाना मालिको को सुरक्षा मिली हुयी है और उनका सारा तकनिकी विकास निजी कम्पनियों द्वारा किया गया है। और चाइना में तकनीकी पुर्जे बनाने वाली छोटी इकाइयों का विशाल आधार होने के कारण सरकारी कम्पनियों को निजी क्षेत्र का सपोर्ट है। भारत में न तो तकनिकी उत्पादन का आधारभूत ढांचा है और न ही निजी कम्पनियों को उत्पादन करने की छूट है। और जिन क्षेत्रो में निजी कम्पनियों को छूट है उन्हें जज-पुलिस-नेता पनपने नहीं देते !!

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(5) तो भारत में बड़े पैमाने पर कारखाने क्यों नही है ? या जो है वे भी कम कीमत में बेहतर उत्पाद क्यों नहीं बना रहे ?
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इसकी दो मुख्य वजहें है :
* जमीन के क़ानून
* जज-पुलिस-नेता का भ्रष्टाचार

भारत के नेताओं ने गेजेट में ऐसा क़ानून छापा हुआ है कि कोई भी व्यक्ति खरबों रूपये की किलोमीटरो के हिसाब से जमीन खरीद सकता है और के बार जमीन खरीदने के बाद उसे पूरी जिन्दगी इस जमीन पर कोई टेक्स नहीं चुकाना होगा !!

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इस वजह से जो जिन लोगो के पास ज्यादा आय है वे जमीन खरीदते है और भूल जाते है। इस वजह से जमीन निरंतर महंगी होती जाती है। आज भारत में जमीन इतनी महंगी हो चुकी है कि जमीन खरीद कर कोई कारोबार शुरू करना प्रेक्टिकली पोसिबल नहीं है। आपके पास यदि पुश्तैनी जमीन है तो बात और है। और कारखाने लगाने के लिए सस्ती जमीन की उपलब्धता पहली जरूरत है। तो जमीन की कीमतें बेहद ऊँची होने कारण कारखाने शुरू करना ही बहुत मुश्किल है।

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और कारखाने चलाने में सबसे बड़ा रोड़ा जज-पुलिस-नेता होते है। यदि आप कारखाना मालिको को इन 3 शिकारियों से बचा पायेंगे तो तो कारखाने चलेंगे वर्ना नहीं चलेंगे। और इसमें भी सबसे खतरनाक शिकारी जज है। जजों का काम है यह है कि जिसका धंधा बढ़ने लगे उससे हफ्ता वसूलना शुरू करो। तो जब तब हम कारखाना मालिको के पैरो में पड़े ये 3 पत्थर नहीं खोलेंगे तब तक भारत में बड़े पैमाने पर तकनिकी उत्पादन नहीं किया जा सकता।

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पाठक इस बात पर ध्यान दें कि इसमें भी सबसे बड़ी बाधा जज है। आप पुलिस एवं नेताओं को कितना भी ईमानदार बना दें, इससे कोई फर्क नहीं आएगा। जज अकेले ही पूरे देश की तकनिकी इकाइयों को पीसने के लिए काफी है। नेता और पुलिस उतने बड़े शिकारी नहीं है जितने बड़े शिकारी जज है। हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज एक ही फैसले से देश की लाखों छोटी इकाइयों को निगल जाता है। और उसे किसी भी तरह से रोका नहीं जा सकता। आप नेता को बाध्य कर सकते है, पुलिस की शिकायत कर सकते हो लेकिन जज सबका बाप है। उनके खिलाफ प्रदर्शन भी करोगे तो वे सीधा गोली चलाने का आदेश देते है, लाठी चार्ज का नहीं।

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**5.1. कैसे जज-पुलिस-नेता गठजोड़ कारखाना मालिकों का शोषण करते है ? **
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जो भी लोग मन्युफेक्चरिंग से जुड़े है वे आपको इस बारे में बताएँगे कि कैसे और कितने तरीको से उनसे घूस वसूल की जाती है। किन्तु वे अपने अनुभव बताने के लिए उपलब्ध नहीं होते। इसकी कई वजहें है। अव्वल तो वे कोरा फेसबुक जैसो मंचो होते नहीं है और यदि होते भी है तो लगभग नहीं के बराबर इसका इस्तेमाल करते है। और इस पर भी वे लिखते नहीं। उन्हें समय मिला तो ज्यादा से ज्यादा थोडा पढ़ लेंगे।

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दूसरी बड़ी वजह यह है कि, जब आदमी कारोबार करता है, तो इस बात को समझ लेता है कि चुपचाप रहकर अपना काम करने में फायदा है। तो वह खुद को जाहिर नहीं करता। जितना ज्यादा वह जाहिर होगा उतना ज्यादा नेता-जज-पुलिस माफिया की नजरो में आएगा और घूस की राशि बढ़ जायेगी। दुसरे शब्दों में वे डरे हुए रहते है, और राजनैतिक मामलों में दखल नहीं देते। वे चुपचाप मार खा लेंगे और घूस दे देंगे। यदि वे लड़ने जायेंगे तो उनका धंधा बंद हो जाएगा।

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दुसरे शब्दों में **एक देश एक कर** का नारा लगाकर जीएसटी का समर्थन करने वाले ज्यादातर लोग वे होते है जिन्हें कभी जीएसटी के रिटर्न नहीं भरने पड़े है। वे 25–50 हजार की नौकरी करते है और अपना समय काटने के लिए सोशल मीडिया पर वे डायलोग दोहराता है, जो इन्हें पेड मीडिया पकड़ा रहा है। और ऐसे में यदि कोई कारोबारी कहता है कि जीएसटी गलत क़ानून है तो ये उसे कहते है कि — तू टेक्स चोर है !!
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जब आप कारखाने के लिए जमीन लेने जाते है तो पैसा देते है। इसके बाद उसके व्यावसायिक अंतरण के लिए लाखों की घूस देते है। इसके बाद पर्यावरण विभाग की अनुमति , बिजली कनेक्शन के लिए घूस देते है। और इसी तरह की आधा दर्जन मदों में घूस देने के बाद आप काम शुरू करते है। और जैसे ही आप प्रोडक्शन शुरू करते है और आपका कारोबार चलने लगता है वैसे ही लगभग 4-5 विभागो की नजरो में आप आ जाते हो, और वे विभिन्न कानूनों के उलंघन करने के आपको नोटिस भेजने लगते है।

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अब या तो आप उन्हें हफ्ता देना शुरू कर दो या फिर अपना धंधा छोड़कर उनके विभागों के चक्कर लगाते रहो। और जैसे ही आप शिकायत लेकर अदालत में जाते हो वैसे ही आप अब जज के ग्राहक बन जाते हो !! इस तरह आप लगातार तावान चुकाते हो और आपका धंधा टूटने लगता है !!

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यदि ऊपर के विवरण गड्ड मड्ड हो गए हो तो मैं इसका सार यहाँ फिर से दोहरा रहा हूँ , और तब आगे की बात कहूँगा :
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**(A) भारत सभी प्रकार के तकनिकी उत्पादन में बुरी तरह से पिछड़ा हुआ क्यों है ?**

इसकी दो वजहें है :
* जमीनों के गलत क़ानून
* जज-पुलिस-नेता का भ्रष्टाचार

उपरोक्त दो वजहों ने ऐसी व्यवस्था की रचना की है कि तकनिकी उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर कारखाने लगाना संभव नहीं है !!

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(B) और भारत सैन्य उपकरण एवं हथियारों का निर्माण क्यों नहीं कर पाता ?**

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क्योंकि निजी क्षेत्र को इसके उत्पादन की अनुमति नहीं है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में यदि आपको बंदूक या टैंक बनाने की कम्पनी खोलनी है तो लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होती है। सिर्फ रजिस्ट्रेशन करवाकर आप ये कम्पनी खोल सकते हो !! जितने भी नियम है वे बेचने पर है। बनाने के लिए कोई नियम नही है। और वहां पर जूरी सिस्टम होने के कारण जजों को हफ्ता नहीं देना पड़ता।

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(C) फिर भारत अन्तरिक्ष मिशन एवं परमाणु कार्यक्रम में कामयाब कैसे हुआ ?**

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क्योंकि ये दोनों कार्यक्रम नियंत्रित दशाओं यानी लैब वगेरह में चलाये जा सकते है। सरकारी कार्यक्रम को संचालित करने वाले शीर्ष अधिकारीयों को जमीन खरीदने का सरदर्द नहीं लेना है, और न ही जज-पुलिस उनसे हफ्ता वसूलने आने वाले है।

**(D) भारत तेजस और अर्जुन का इंजन बनाने में असफल क्यों हुआ ?**

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क्योंकि इंजन जैसा जटिल उपकरण लैब में नहीं बनाया जा सकता है, और बाजार इसका उत्पादन न करें इसके लिए नेताओं ने काफी सारे क़ानून छाप कर रखें हुए है।

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अब हम अगले प्रश्न पर आते है :
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**(6) फिर भारत मिसाइलें बनाने में कैसे सफल हुआ ?**

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जैसा कि मैंने बताया कि हथियारों का निर्माण करने का मेथड यह है कि इसका विकास बाजार में किया जाता है , लेब में नहीं। यदि आप लैब में इसका उत्पादन करने की कोशिश कर रहे है तो यह चांस लेने वाली बात है। तो कभी आपकी लॉटरी लग जाती है, और कभी नहीं लगती !!

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निचे मैंने बताया है कि कैसे रोकेट बनाने की तकनीक हम तक पहुंची और कैसे हमने इसका इस्तेमाल करके मिसाइले खड़ी की। और कैसे यह मेथड नहीं बल्कि शुद्ध रूप से एक लॉटरी यानी किस्मत थी !! या दुसरे शब्दों में कहे तो वक्त हमारे साथ था !!

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1960 की बात है जब अमेरिका को भारत के थुम्बा***** से एक सेटेलाइट लांच करना था। भारत के इंजीनियरों को शुरूआती चरणों की ट्रेनिंग देने के लिए कुछ इंजीनियरों को नासा ने अमेरिका बुलाया। और इस दल में डॉ कलाम भी थे। ये लोग 4 महीने नासा में रुके, ताकि अमेरिकी सेटेलाइट की उड़ान के लिए भारत में प्राथमिक तैयारियां कर सके। 1963 में अमेरिका ने अपना सेटेलाईट थुम्बा से छोड़ा।

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और इसके बाद फ़्रांस, सोवियत रूस आदि देशो ने भी अपने कई सेटेलाईट थुम्बा से प्रक्षेपित किये।

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[ (*****) चुंबकीय भूमध्य रेखा के बेहद समीप होने के कारण थुम्बा अंतरिक्ष प्रक्षेपण के लिए आदर्श स्थल है। तो भारत को प्रकृति ने थुम्बा दिया और अमेरिका समेत कई देशो को भारत को अन्तरिक्ष कार्यक्रम में सहयोगी बनाना पड़ा !! ]

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1965 में होमी जहांगीर भाभा ने भारत में सेटेलाईट लांचर विकसित करने की योजना पर काम शुरू किया, और इसी क्रम में भारत ने नासा से इसका एक प्रोटोटाइप माँगा। अमेरिका ने इसकी तकनीक देने से इंकार कर दिया। इसी बीच डॉ कलाम* ने भारत सरकार को बताया कि उन्होंने नासा में रहते हुए वे तमाम बारीकियां पकड़ ली है जिससे हम अपना व्हीकल बनाने का प्रोजेक्ट शुरू कर सकते है !!

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[ (*****) कलाम इस प्रोजेक्ट की चाबी थे। यदि वे भारत न लौटते या देश छोड़ देते तो उनका कैरियर ज्यादा चमकदार होता। उन्होंने देश चुना। मेरे मानने में ऐसा बहुत कम होता है कि इस स्तर का कोई प्रतिभाशाली इंजिनियर निजी क्षेत्र के अपने कैरियर को लात मारकर सरकारी प्रोजेक्ट पर काम करें। यह एक दुर्लभ उदाहरण है। ऐसे लोग बहुत मुश्किल से पैदा होते है। यह हमारी किस्मत थी कि इस दल में कलाम मौजूद थे।]
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डॉ कलाम ने भारत आकर इस पर काम करना शुरू किया और भारत ने अपना पहला सेटेलाईट व्हीकल बनाकर सफलता पूर्वक प्रक्षेपण किया। डॉ कलाम द्वारा बनाया गया यह व्हीकल हूबहू अमेरिका के व्हीकल के समान था। तकनीक, आकार, वजन से लेकर लम्बाई भी ( 23 मीटर )।

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ऐसी कई तकनीक होती है जिन्हें शान्ति कार्यो जैसे सेटेलाईट आदि के लिए साझा किया जाता है, किन्तु सैन्य तकनीके किसी भी रूप में साझा नहीं की जाती और इन पर काफी कठोर प्रतिबन्ध रहते है।

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6.1. और कैसे डॉ कलाम ने सेटेलाईट तकनीक का इस्तेमाल भारत में मिसाइले खड़ी करने में किया ?**
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इसी दौरान फ़्रांस द्वारा भी भारत से एक व्हीकल लांच किया गया था। फ़्रांस के प्रोजेक्ट से डॉ कलाम ने राकेट में तरल इंधन का इस्तेमाल करने की तकनीक पकड़ी। बाद में तरल इंधन की इस तकनीक का प्रयोग पहले पृथ्वी एवं बाद में अग्नि मिसाइलो में किया गया।

[India's Missiles - With a Little Help from Our Friends](<https://www.wisconsinproject.org/indias-missiles-with-a-little-help-from-our-friends/#note-1-ref>;)

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जर्मन के साथ 1976 में सेटेलाईट प्रोजेक्ट पर काम करते हुए डॉ कलाम ने कंपोजिट मेटल और गाइडेंस सिस्टम की बारीकियां पकड़ी और बाद में इनका इस्तेमाल मिसाइलो को बनाने में किया गया। और अंत में जर्मनी के साथ सेटेलाईट प्रोजेक्ट पर काम करते हुए भारत को APC-Rex ( Motorola 68000 microprocessor ) मिला जिसने हमारी मिसाइल तकनीक की अंतिम जरूरत पूरी की।

[Bulletin of the Atomic Scientists](<https://books.google.co.in/books?dq=indian+satellite+and+missile+system+foreign+assistance+thumba+kalam+motorola&hl=en&id=6AUAAAAAMBAJ&lpg=PA31&ots=9EI9Q-42Hr&pg=PA31&sa=X&sig=ACfU3U0AbzrkoorGNm1enrNy76FJ_bMUvw&source=bl&ved=2ahUKEwid982jsI_jAhWQV30KHR-mADIQ6AEwDnoECAgQAQ#v=onepage&q&f=false>;)

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डॉ भाभा थोरियम के परमाणु रिएक्टर की तकनीक पर काफी बढ़ चुके थे। अंतत: सीआईए ने उनकी हत्या करवा दी। लेकिन वे कलाम तक नहीं पहुँच सके और हमारा मिसाईल मिशन आगे बढ़ता रहा।

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परमाणु बम के लिए भारत को तकनीक अमेरिका और कनाड़ा से मिली। कनाड़ा ने भारत को एक रिएक्टर और अमेरिका ने हेवी वाटर दिया था। ये हस्तांतरण पीस प्रोजेक्ट यानी पॉवर प्लांट आदि के लिए था। इंदिरा जी ने इसका इस्तेमाल परमाणु बम की तकनीक विकसित करने में किया और परमाणु धमाके किये।

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अमेरिका तब से इंदिरा जी को गिराने के प्रयास में लग गया था, और उसने भारत के तमाम विपक्षी नेताओं-जजों-अधिकारियों एवं कोंग्रेस के अन्य नेताओं के आगे टुकड़े फेंके। अंत में अमेरिका इंदिरा जी को सब तरफ से घेरने में कामयाब रहा और उन्हें आपातकाल लगाना पड़ा। दरअसल भारत के पास आज जो भी अपना है और जिसकी वजह से भारत आज तक टिका हुआ है उसमे इन 4 लोगो को योगदान काफी महत्त्वपूर्ण है — डॉ भाभा , डॉ कलाम, डॉ साराभाई एवं इंदिरा जी !!

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1990 के बाद हमें जितने भी नेता मिले उन्होंने हमारे देश में अमेरिकी कम्पनियों का नियंत्रण बढाने में कोई कसर नहीं रखी। और आज अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का स्वर्ण काल चल रहा है। विकास के नाम पर देश की सभी राष्ट्रीय संपत्तियां OLX पर है। जिसे जितना चाहिए खरीद सकता है।

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**(7)** **ऊपर दिए गए प्रश्न के जो गलत एवं अस्पष्ट जवाब चलन में है।
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**7.1. भारत में R&D नहीं है।**

जो लोग कहते है कि भारत में R&D नहीं है। वे इस बारे में कभी कुछ नहीं कहते है कि R&D क्यों नहीं है !! उनका कहना होता है - बस R&D नहीं है। बात ख़त्म। और इस सवाल को वे टाल देते है कि R&D बढे इसके लिए गेजेट में कौनसे क़ानून छापने चाहिए।
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मेरा जवाब है कि -** **जब हथियार बनाने की अनुमति ही नहीं है तो R&D किस पर करेंगे ? हवा में ? पैसा कौन लगाएगा ? और कहाँ लगाएगा। और यदि आपने करोड़ो रूपये घूस खिलाकर लाइसेंस ले भी लिया तो जजों को हफ्ता दोगे या R&D पर निवेश करोगे !! तो R&D वही कर सकता है जिसके पास नेता-पुलिस-जज को कंट्रोल करने की क्षमता हो। सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ही ऐसा कर सकती है। और जब वे आते है तो जीएसटी जैसे क़ानून छपवाकर मार्केट में से सभी कम्पनियों को साफ़ कर देते है।

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7.2. भारत के लोगो में देशप्रेम नहीं है, इसीलिए काबिल लोग देश छोड़ देते है। मतलब Brain Drain !!
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ब्रेन ड्रेन क्यों है, और इसे रोकने के लिए कौनसे क़ानून छापने है — यह सवाल वे लेते नहीं है।

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मेरा जवाब है कि — हर आदमी बेहतर अवसर और बेहतर जगह की तलाश में रहता है। भारत में विमान के इंजन , टैंक के इंजन, रायफल आदि बनाने की कितनी कम्पनियां है ? जीरो !! तो टेलेंटेड इंजीनियर्स इधर बैठकर क्या करेंगे !! तुम लोग मोबाइल और पंखो के केपिसिटर बनाने की कम्पनियां नी पनपने दे रहे हो जटिल इंजीयरिंग की तो बात ही दूर है। मतलब इधर बैठकर क्या तलेंगे वो ? अपना देश कोई नहीं छोड़ना चाहता !! पर तुमने क़ानून ही ऐसे छापे है कि अपने आप ही देश छूट जाता है।

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एक जमीन खरीद कर 3–4 साल तक उधर न जाओ तो कोई भी इस पर कब्ज़ा कर लेता है, और इसे वापिस हासिल करने में दशको तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते है !! ये दशा है क़ानून व्यवस्था की !! तो ब्रेन ड्रेन तो होना वाजिब है !! गलत क्या है इसमें !! अमेरिका-फ़्रांस-रूस से कितना ब्रेन ड्रेन हो रहा है यहाँ पर ? पर तुमने अदालतों और थानों को सुधारने के कानूनों पर तो बात करनी नहीं है, 5 किलोमीटर लम्बा भाषण ब्रेन ड्रेन पर देना है !!

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7.3. भारत में राजनैतिक भ्रष्टाचार है, नौकरशाही सुस्त है, राजनैतिक संस्कृति निम्न है आदि
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मेरा जवाब - राजनैतिक संस्कृति नाम की तो कोई चीज होती ही नही है। और जहाँ तक शासकीय सुस्ती एवं भ्रष्टाचार का सवाल है, भारत की अदालतों ने देश का कबाड़ा किया हुआ है। देश में सारा भ्रष्टाचार और अपराध सिर्फ इसीलिए है क्योंकि हमारे जज भ्रष्ट है। वे पैसा खाकर अपराधियों को या तो छोड़ देते है या तारीख पर तारीख देते रहते है। और जिस देश में जज भ्रष्ट हो जाते है, वहां क़ानून नाम की कोई चीज नहीं होती है। तब चयनात्मक न्याय होता है। यदि जेब में पैसा और रसूख है तो क़ानून आपकी जेब में है। और जजों के भ्रष्टाचार पर ये ज्ञानी और बुद्धिजीवी लोग बात नहीं करना चाहते। और यदि बात करते भी है तो यह बिंदु कभी नहीं उठाने देते कि गेजेट में क्या छापने से अदालतें ठीक होगी।

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**(8) **समाधान ?**
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**8.1. फर्जी और आत्मघाती समाधान : **अमेरिकी** **बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में आकर हथियारों का उत्पादन करने की अनुमति देना एक आत्मघाती समाधान है। मतलब मैं इसे सीधे सीधे एंटी नेशनल स्टेप कहने से गुरेज नहीं करूँगा। जिस तरह अभी पूरे देश का सोशल मीडिया नेटवर्क सिर्फ 3 अमेरिकन कम्पनियों के हाथ में है और किसी भारतीय कम्पनी की हैसियत ही नहीं है कि वे इसमें घुसने की कोशिश भी कर सके तो इससे भी बदतर हालत हथियारों के क्षेत्र में होने वाली है। एक बार यदि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने आकर यहाँ हथियार बनाने शुरू किये तो इसका अवश्यम्भावी नतीजा है — भारत की सेना उन पर बुरी तरह से निर्भर हो जायेगी। और सेना की निर्भरता दुसरे देश पर होने का मतलब क्या होता है कहने की जरूरत नहीं है।
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मतलब 70 साल तक तुमने भारत के लोगो को हथियार नहीं बनाने दिए , और पेड मीडिया के माध्यम से नागरिको के दिमाग में यह कीले ठोकते रहे कि भारत हथियार नहीं बना पा रहा है, भारत में कैपेसिटी नहीं है आदि आदि । और अब अमेरिकी कम्पनियों को भारत में आकर हथियार बनाने को कह रहे हो !!
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सीधे सीधे अमेरिकी जनरल ही नियुक्त क्यों नहीं कर देते भारतीय सेना में। जिस तरह जुकेरबर्ग हमारा सोशल मीडिया चला रहा है, वो हमारी सेना भी चला लेंगे। बहरहाल, मैं इस कदम के सख्त खिलाफ हूँ, और जो आदमी इस कदम का समर्थन करता है मैं उसे समझाने की कोशिश भी नहीं करता। क्योंकि इस कदम का समर्थन करने वालो में जिस लेवल का आई क्यू होता है, उन्हें मैं मीट नहीं कर सकता। गोरो के चले जाने से इनमे छटपटाहट है। जब तक फिर से गोरो को बुलाकर ये अपनी सेना उन्हें नहीं सौंप देते ये रुकने वाले नहीं है।

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**8.2. वास्तविक समाधान : **मैं इस समस्या के समाधान के लिए 3 क़ानून ड्राफ्ट गेजेट में प्रकाशित करने का सुझाव देता है। एक क़ानून स्वदेशी हथियारों के निर्माण को लाइसेंस मुक्त करता है। और दूसरा क़ानून अदालतों-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार में तेजी से गिरावट लाएगा।
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**8.2.1. भारत में स्वदेशी हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट**

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*==== ड्राफ्ट का प्रारम्भ====
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1. यह क़ानून सिर्