> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-02-03

Pawan Jury BhilwaraRj

मीडिया कैसे काम करता है।
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टीवी या मीडिया समूह जो भी प्रसारण करते है उसका चयन करने के लिए एक समान्य प्रक्रिया का अनुसरण होता है। निचे वह प्रक्रिया दी गयी है।
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सबसे पहले यह समझना जरुरी है कि टीवी अपना खर्चा कैसे निकालता है ? मतलब वह पैसे कैसे बनाता है ?
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एक आम धारणा यह है कि टीवी विज्ञापन से पैसा बनाता है। जबकि सच्चाई यह है कि टीवी जो कुछ भी दिखाता है , उससे पैसा बनाता है। इसे और भी स्पष्ट रूप से यूँ कह सकते है कि किसी मीडिया समूह की टीवी स्क्रीन एक प्लाट है जो कि 24 घंटे प्रसारण के उपलब्ध है। जिसे जो भी विषय वस्तु दिखानी है , वह उसके लिए पैसा देगा और बतायेगा कि इस विषय को इस तरह और इतने घंटे के लिए दिखाना है। और वह यह भी बतायेगा कि इस विषय को खबर(*) के रूप में दिखाना है , या विज्ञापन के रूप में दिखाना है , आदि आदि। टीवी उससे पैसा लेगा , और वह विषय वस्तु इस तरह के कलेवर में प्रस्तुत करके पेश कर देगा कि पैसा देने वाले व्यक्ति का उद्देश्य पूरा हो जाए।
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(*) यदि आप कोई सूचना खबर का लेबल लगाकर देना चाहते है तो आपको 2 से 4 गुणा तक ज्यादा दाम चुकाने होते है। विज्ञापनों की दरे काफी कम होती है। उदाहरण के लिए मान लीजिये कि कोई अभिनेता सेना को 20 लाख का दान देता है, और अब वह यह जानकारी देश के लोगो तक भी पहुँचाना चाहता है कि मैंने 20 लाख का दान दिया है। तो वह मीडिया से इसे खबर के रूप में दिखाने के लिए कहेगा। मीडिया उससे 1 करोड़ रूपये लेगा और इस बात को खबर के रूप में दिखायेगा कि अमुक अभिनेता ने सेना को 20 लाख का दान दिया है !!
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मैं इसे और भी स्पष्ट करता हूँ :
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मान लीजिये कि A एक पॉलिटिकल स्पोंसर(**) है। A पेड रविश कुमार जी को 2 करोड़ प्रति एपिसोड की दर से 15 एपिसोड के लिए 30 करोड़ का भुगतान करेगा और कहेगा कि प्राइम टाइम पर वे 15 दिन पर नियमित रूप से बेरोजगारी के मुद्दे पर इस तरह का प्रसारण करे कि मोदी साहेब सवालों के घेरे में आये। पेड रविश कुमार जी मेहनत करके रिसर्च करेंगे और बेरोजगारी पर वास्तविक तथ्यों से सजी हुयी रिपोर्ट इस तरह तैयार करेंगे कि बेरोजगारी का मुद्दा उछल कर आये।
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(**) पॉलिटिकल स्पोंसर : जो व्यक्ति समूह राजनैतिक पार्टियों का खर्चा चलाते है , उनके प्रचार के लिए भुगतान करते है और यह सुनिश्चित करते है कि कौनसी पार्टी सत्ता में आएगी। ज्यादातर ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां एवं उद्योगपति होते है। पार्टियों के एजेंडे भी यही बनाते है , और सरकार में आने के बाद यही लोग तय करते है कि सरकार कौनसे क़ानून लागू करेगी और कौनसे नहीं करेगी। प्रत्येक पार्टी के पॉलिटिकल स्पोंसर अलग अलग नही है। पॉलिटिकल स्पोंसरो का समूह सभी पार्टियों को स्पोंसर करता है, और शीर्ष स्तर पर इनमे ज्यादातर हितो का टकराव नहीं होता। इसके अलावा भी अलग अलग छोटे मोटे पॉलिटिकल स्पोंसर होते है, जिनके हितो में वक्ती तौर पर टकराव हो सकता है। किन्तु कोंग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी समेत सभी मुख्य धारा की पार्टियों के सुपर पॉलिटिकल स्पोंसर एक ही है।
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अब 2 एपिसोड प्रसारित करने के बाद पेड रविश कुमार जी श्री अरविन्द केजरीवाल और श्री नितीश कुमार के स्पोंसरो को फोन करके कहेंगे कि बेरोजगारी की सीरिज में हम इन दोनों राज्यों की बदहाली को भी कवर करने वाले है। केजरीवाल जी और नितीश जी के स्पोंसर उन्हें 25-25 लाख के विज्ञापन देने का वादा कर देंगे ताकि वे नितीश जी एवं अरविन्द जी को इसमें न घसीटे। लेकिन यदि A कहता है कि इन दोनों राज्यों को भी कवर करना है और इसके लिए अतिरिक्त भुगतान भी करता है तो पेड रविश कुमार इन दोनों राज्यों को भी कवर करेंगे। पर यदि नितीश के पॉलिटिकल स्पोंसर A को एप्रोच करके उससे सेटलमेंट कर लेते है तो A पेड रविश कुमार जी को कहेगा कि बिहार को कवर न करे।
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इसी तरीके से पॉलिटिकल स्पोंसर B पेड अर्नव पेड गोस्वामी जी और पेड सुधीर चौधरी जी को कुछ दिनों का कॉन्ट्रेक्ट देगा, और उन्हें नियमित दिनों के मुद्दे भी देगा। स्पोंसर A रविश कुमार जी के साथ साथ पेड अर्नव पेड गोस्वामी जी एवं पेड दीपक चौरसिया जी के चेनल पर भी कुछ घंटो के प्लाट खरीदेगा। चूंकि सुधीर चौधरी जी को बेरोजगारी कवर करने के लिए पेमेंट नहीं हुयी है , अत: सुधीर जी बेरोजगारी कवर नहीं करेंगे। यदि उन्हें इंडोनेशिया की बेरोजगारी एवं महंगाई कवर करने के लिए पेमेंट मिल जाती है तो पेड सुधीर चौधरी जी इंडोनेशिया की बेरोजगारी को इस तरह से कवर कर देंगे कि आप भारत की बेरोजगारी को भूल कर इंडोनेशिया की बेरोजगारी पर च्च च्च…च्च करने लगेंगे !!
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इसी दौरान यदि कोई स्पोंसर थोड़ी सी सीरियस कोमेडी करने के लिए भुगतान करता है तो पत्रकार 2000 के नोटों में चिपे इंस्टाल करने की ख़बरें भी चलाने के लिए तैयार हो जायेंगे !!! सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि पेमेंट कितनी की जा रही है।
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अब ये सभी पत्रकार अपनी तैयारी के साथ मंच सजायेंगे।
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डिबेट में आमंत्रित राजनीतिज्ञों, विषय विशेषज्ञों एवं वरिष्ठ पत्रकारों का चयन :
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अपनी शेली के अनुसार पेड रविश कुमार जी कुछ गंभीर किस्म के ज्ञानी लोगो को फोन करके कहेंगे कि यदि आज आपको टीवी पर आना है तो इस विषय पर बोल सकते है। किन्तु आपको स्टेंड यह लेना है कि बेरोजगारी बढ़ रही है , और इसमें गलती मोदी साहेब की है। आमंत्रित व्यक्ति टीवी पर आकर इसी लाइन पर डिबेट करेगा , क्योंकि वह जानता है कि यदि उसने रविश कुमार जी द्वारा बतायी गयी लाइन नहीं ली तो आइन्दा रविश कुमार जी उसे बुलाने की जगह किसी दुसरे चंगु मंगू को विशेषग्य बनाकर बिठा लेंगे। इसी बीच यदि स्पोंसर A कहता है कि अमुक आदमी को बुलाओ या अमुक आदमी को न बुलाओ तो रविश कुमार जी इन निर्देशों का पालन करेंगे।
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इसी तरह से पेड अर्नव पेड गोस्वामी जी भी अपने स्पोंसर के अनुकूल विशेषग्य चुनेंगे और टीवी पर बिठाकर मुर्गे लड़ायेंगे। स्पोंसर C पेड रजत शर्मा जी को 10 करोड़ का भुगतान करेंगे और बताएँगे कि इस बार आप की अदालत में किसका इंटरव्यू कराना है। स्पोंसर यह भी बतायेगा कि कौनसे सवाल पूछे जायेंगे और कौनसे नहीं पूछे जायेंगे। इंटरव्यू में नेता भी स्पोंसर के निर्देशों का पालन करेगा और किसी विशेष विषय पर वही जवाब देगा। वर्ना स्पोंसर अमुक नेता को स्पोंसर करना बंद कर देगा और टीवी / अख़बार से प्लग खींच लिए जाने पर नेताजी की राजनीति ख़त्म हो जायेगी।
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अमूमन सभी मीडिया समूहों के विशेषग्य लगभग तय होते है , और वे घूम फिर कर उन्हें ही पकड कर लाते है। जो बार बार आते रहते है और जिन्हें आप सिर्फ टीवी की वजह से जानते है उन्हें कभी कभार कुछ खर्चा पानी ( मानदेय ) वगेरह दे दिया जाता है। किन्तु कद वाले विशेषज्ञों को कुछ नहीं दिया जाता। टीवी पर बुलाकर उन्हें जो ख्याति दी जा रही है , वही उनकी पेमेंट है। इस ख्याति की वजह से वे लाखों करोड़ो बना लेते है।
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दरअसल विषय के विशेषग्य नाम की कोई चीज होती नहीं है। मान लीजिये कि देश में किसी विषय के 5,000 विशेषग्य है। किन्तु उन्हें कोई सुनता या पूछता नहीं है। जो टीवी पर आएगा उसी की बात सुनी जाएगी। तो टीवी पर जब उसे बुलाया जाता है तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी विशेषग्य राय क्या है , बल्कि फर्क इस बात से पड़ता है कि स्पोंसर उससे क्या कहलाना चाहता है। यदि विशेषग्य स्पोंसर की लाइन नहीं लेता है , तो स्पोंसर उसे बुलाने की जगह ऐसे विशेषग्य को बुलाएगा जो उसकी लाइन पर बोलने को तैयार हो।
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इसी दौरान कभी अचानक सुपर पॉलिटिकल स्पोंसर X परिदृश्य में आता है और प्रत्येक मीडिया समूह को 500 करोड़ का भुगतान करके सभी टीवी चेनल्स के अगले 7 दिन के 24*7 घंटो के प्लाट खरीद लेता है !! अब वह उन्हें निर्देश देता है कि अगले 7 दिन तक सभी चैनलों पर हर समय सिर्फ द अन्ना एवं जनलोकपाल की कथा प्रसारित की जायेगी। अब बेरोजगारी सीरिज और इस तरह की ख़बरें स्थगित हो जायेगी और सभी कैमरे 24 घंटे The Anna को कवर करेंगे।
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क्योंकि X बेहद ताकतवर है , और वास्तविक रूप से मीडिया को पूरी तरह से कंट्रोल करता है। X देश के सारे टीवी चेनलो एवं अखबारों के प्लाट अगले 1 वर्ष तक चार गुना भुगतान करके खरीद सकता है और पूरे देश को किसी भी दिशा में सोचने के लिए बाध्य कर सकता है , नेताओ को चुनाव हरवा सकता है, जीता सकता है आदि आदि। मीडिया के माध्यम से X के पास भारत का सबसे बड़ा वोट बेंक है , अत: सभी नेता टिके रहने के लिए X पर निर्भर करते है। X हथियार , तेल , बैंक , दवाइयाँ , भारी मशीनरी आदि का उत्पादन करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको का समूह है।
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यदि सुपर पॉलिटिकल स्पोंसर पीएम से नोट बंदी करवाना चाहता है तो वह इसके लिए मीडिया को भी करोड़ो रूपये का भुगतान करेगा कि नोट बंदी पर सकारात्मक कवरेज दिया जाए। वह सभी अख़बारो को भी पेमेंट करेगा और इसके लिए प्लाट खरीदेगा। सभी विशेषज्ञों एवं स्तम्भ लेखको को भी यह कहा जाएगा कि यदि वे नोटबंदी के खिलाफ लिखेंगे या बोलेंगे तो उन्हें न तो टीवी पर दिखाया जाएगा और न ही उनके कोलम अख़बार में आयेंगे।
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इस तरह स्पोंसर मीडिया का इस्तेमाल करके नोट बंदी के पक्ष में देश व्यापी माहौल बनाएगा। यदि पीएम कोई फैसला लेना चाहते है और X इनकार कर देता है तो पीएम वह फैसला नहीं लेगा। क्योंकि X फैसले का असीमित नकारात्मक कवरेज करवाने के लिए मीडिया को भुगतान करेगा जिससे पीएम को वोटो की भारी क्षति होगी।
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अमूमन सुपर पॉलिटिकल स्पोंसर किसी मुद्दे पर जो लाइन देता है, सभी पॉलिटिकल पार्टियाँ , सभी नेता , सभी कलमकार , सभी कलाकार , सभी विषय विशेषग्य आदि उसी लाइन का अनुसरण करेंगे। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो आप उन्हें टीवी पर कभी नहीं देख पायेंगे। उदाहरण के लिए भारत को जो रफाल प्लेन बेचे जा रहे है , वे सुपर पॉलिटिकल स्पोंसर समूहों की कम्पनी के है , तो सभी को यह निर्देश दिए जायेंगे कि वे रफाल में रखे गए किल स्विच के बारे में कोई चर्चा नहीं करेंगे।
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कोंग्रेस को भी यह निर्देश दिए जायेंगे कि वे रफाल में सिर्फ घोटाले का मुद्दा उठा सकते है , किल स्विच का नहीं। तो कोंग्रेस रफाल में किल स्विच का मुद्दा नहीं उठाएगी, यदि कोंग्रेस का कोई नेता किल स्विच की बात करेगा तो उसे आइन्दा आप कभी टीवी या अखबार पर नहीं देखेंगे। इस तरह मीडिया में आप जितना भी प्रसारण देखते है वह सभी स्क्रिप्टेड होता है !! टीवी का कोई भी ऐसा लम्हा नहीं है जिसके लिए किसी न किसी के द्वारा भुगतान नहीं किया जा रहा है। बस फर्क यह है कि हमको यह पता नहीं है कि किस खबर को किस रूप में दिखाने के लिए कितनी पेमेंट की गयी है।
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समाचार पत्रों में सिर्फ़ विज्ञापन ही सच्चे होते है — थोमस जेफरसन , अमेरिका के तृतीय राष्ट्रपति 1810.
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सभी राजनैतिक ख़बरों के लिए भुगतान किया जाता है, और सबसे अधिक भुगतान उन खबरो के लिए किया जाता है, जिन्हें दिखाना बेहद ज़रूरी था, किंतु नही दिखाया गया — जेफरसन , 1820.
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जो व्यक्ति समाचार पत्र नही पढ़ता उसके पास ज़्यादा सच्ची ख़बरें होती है — ( कथन किसका है, ठीक से याद नही ) शायद जार्ज बर्नार्ड शॉ का है।
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और अंत में — मीडिया ख़बरें छुपाने के कारोबार में है !!
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दरअसल मीडिया का सही नाम पैड मीडिया है , और सबसे गम्भीर समस्या यह है कि पैड मीडिया में विज्ञान-गणित को छोड़कर कक्षा 1 से मास्टर डिग्री और PHD तक की सभी पाठ्यपुस्तकें शामिल है !!!
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क्या मिडिया को निष्पक्ष या अनपेड बनाया जा सकता है ?

मिडिया सदा से पेड मिडिया रहा है, और ऐसा ही रहेगा। पेड मिडिया को अनपेड मिडिया नहीं बनाया जा सकता, लेकिन सिटीजन पेड मिडिया बनाकर निष्पक्ष मिडिया की स्थापना की जा सकती है।

क्यों पेड मिडिया को अनपेड मिडिया नहीं बनाया जा सकता ?

मिडिया की आय के दो ही स्त्रोत हो सकते है -- १) प्रसारण के दर्शक या पाठक , २) विज्ञापन।

यदि कोई मिडिया समूह सिर्फ पाठको पर निर्भर रहेगा तो अखबार की लागत कई गुना बढ़ जायेगी। जो अखबार आपको 2 रूपये में मिल रहा है, वह आपको 15 रूपये में मिलने लगेगा इससे पाठको और दर्शको की संख्या घटेगी, फलस्वरूप लागत और भी बढ़ जायेगी। अंतत: मिडिया घाटा खाकर बंद हो जाएगा या फिर विज्ञापन स्वीकार करेगा। तब विज्ञापन दाता इस शर्त पर विज्ञापन देना मंजूर करेंगे जब मिडिया समूह उन्हें और उनके समर्थको को नुकसान पहुंचाने वाली खबरों का प्रसारण नही करे। स्पष्ट है, ऐसे हालात में मिडिया कर्मियों से चैनल या अखबार बंद करने की उम्मीद नही की जा सकती अत: वे विज्ञापन दाताओ के हाथ बिक जाएंगे।

इसके अलावा यदि कोई मिडिया समूह नेताओ, या धनिक वर्ग के खिलाफ प्रसारण करता है, तो मौद्रिक नुकसान तो खैर होगा ही, लेकिन सरकार उनके खिलाफ कई प्रकार की जाँचे शुरू करवा कर उन्हें झूठे-सच्चे मुकदमो में फंसा देगी। अंतत मिडिया समूह को अस्तित्व बचाये रखने के लिए सरकार, नेताओ और धनिक वर्ग के एजेंडे पर कार्य करना पड़ेगा। .

फिर कैसे हम निष्पक्ष मिडिया की स्थापना कर सकते है ?

इसके लिए हमें ऐसे मिडिया की आवश्यकता है, जो नागरिको द्वारा पेड हो। अर्थात ऐसे मिडिया हाउस के स्टाफ, वेतन, जमीन तथा संस्थापना आदि से सम्बंधित खर्चे नागरिको द्वारा दिए जाए। तब ऐसे मिडिया को विज्ञापन दाताओ पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं रह जायेगी, और वह निष्पक्ष रूप से नागरिको के हित में सच्ची खबरों का प्रसारण करेगा। अच्छी बात यह है कि भारत के नागरिको के पास पहले से ही ऐसा मिडिया समूह मौजूद है, लेकिन वह अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है। यह मिडिया समूह दूरदर्शन है। दूरदर्शन के पास पूरे देश में जमीन और प्रसारण केंद्र है। इसके स्टाफ, वेतन आदि संचालन से सम्बंधित खर्चे भी नागरिको से वसूल किये गए टैक्स से चुकाए जाते है।

आज दूरदर्शन के संसाधनो और दर्शको का जोड़ देश के सभी निजी चैनलों के संसाधनो और दर्शको की संख्या के जोड़ से ज्यादा है। लेकिन अकूत संपत्ति और पेट भर के दर्शक संख्या होने के बावजूद दूरदर्शन घटिया प्रसारण की पराकाष्ठा को सिर्फ इसीलिए मेन्टेन रखे हुए है, क्योंकि निजी चैनल्स द्वारा दूरदर्शन के प्रसारण को घटिया स्तर का बनाये रखने के लिए घूस दी जाती है। यदि दूरदर्शन अपने संसाधनो का उचित इस्तेमाल करे तो भारत के करोड़ो नागरिको को स्तरीय मनोरंजन और निष्पक्ष खबरें उपलब्ध करवा सकता है। दूरदर्शन अपने खुद के स्पोर्ट्स चैनल, मूवी चैनल्स शुरू कर सकता है, गुणवत्ता प्रधान धारावारिको का फिर से निर्माण शुरू कर सकता है, और हर तरीके से निजी चैनल्स को कड़ी टक्कर दे सकता है। लेकिन दूरदर्शन के घटिया प्रसारण के कारण निजी मिडिया समूहों ने भारत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है।

दूरदर्शन के पुनर्गठन के लिए प्रस्तावित ढांचा :

हमारा प्रस्ताव है कि -

1. दूरदर्शन को 5 स्वतंत्र चेनलो में विभाजित किया जाए। एक चैनल प्रधानमन्त्री के सीधे नियंत्रण में होगा, तथा अन्य चार अपने अपने स्तर पर स्वतंत्र होंगे। इन सभी चेनल्स के अध्यक्ष को नौकरी से निकालने का अधिकार जनता के पास होगा। ऐसा इसलिए ताकि सच्ची खबरे तथा मूल्य परक मनोरंजन के प्रसारण के लिए प्रतिस्पर्धा बनी रहे। निजी चेनल्स भी मुक्त रूप से प्रसारण के लिए स्वतंत्र होंगे।

2. प्रत्येक राज्य के पास दो चैनल अलग से होंगे। एक फ्री टू एयर तथा एक केबल के माध्यम से प्रसारित होने वाला। दोनो चैनल राज्य के मुख्यमंत्री के सीधे नियंत्रण में होंगे, तथा मुख्यमंत्री को नौकरी से निकालने का अधिकार राज्य के मतदाताओ के पास होगा।

3. राष्ट्रीय और राज्यों के दूरदर्शन विभाग एक दैनिक समाचार पत्र तथा साप्ताहिक पत्रिका भी प्रकाशित करेंगे। इनका पीडीएफ वर्जन भी वेबसाइट पर रखा जाएगा तथा कोई भी समाचार पत्र इस सामग्री को प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र होगा।

4. दूरदर्शन स्टाफ की नियुक्ति प्रक्रिया सिर्फ लिखित परीक्षा के माध्यम से की जायेगी तथा स्टाफ को नैकरी से निकालने का अधिकार नागरिको की ज्यूरी के पास होगा।

5. यदि दूरदर्शन के स्टाफ द्वारा घूस खाकर खबरे दिखाना पाया जाता है तो नागरिको की ज्यूरी उनका सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट ले सकेगी, उन्हें नौकरी से निकाल सकेगी तथा जेल में भेज सकेगी। जिन कर्मचारियों को यह शर्ते मंजूर नहीं होगी, उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा।

राईट टू रिकॉल दूरदर्शन चेयरमेन के इस प्रस्तावित कानून का ड्राफ्ट देखने के लिए यह लिंक देखें - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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