> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-10-07

Pawan Jury BhilwaraRj

यदि कोई उम्मीदवार चुनाव पूर्व ऐसा शपथ पत्र देता है कि -- "यदि मैं किये गए वादे पूरे न करूँ तो जनता मुझे बेदखल कर सकती है।" तो ऐसे शपथ का क्या कानूनी प्रभाव होगा।
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ऐसे शपथपत्र की कोई लीगल वेल्यू नही होती है , अतः वादे तोड़ने पर भी किसी विधायक को बेदखल नही होना पड़ेगा।
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कैसे ?
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१) शपथपत्र “फ़ेक्ट शीट” होती है । जिसमें शपथकर्ता सिर्फ़ “तथ्यों” को दर्ज करता है , तथा यह घोषणा करता है कि मुझ से सम्बंधित यह “तथ्य” सही व सत्य है । जैसे - मेरे पास इतनी सम्पत्ति है , मुझ पर इतने मुक़दमे है आदि आदि । यदि शपथ पत्र में दर्ज किये गए ये तथ्य ग़लत पाए जाते है तो अमुक विभाग / संस्था शपथकर्ता पर झूठे तथ्य बताने के एवज़ में मुक़दमा कर सकता है । लेकिन किसी भी शपथ पत्र में सिर्फ़ भूतकाल एवं वर्तमान के तथ्यों को ही दर्ज किया जाता है , भविष्य के “वादे” इसमें शामिल नही किए जाते। चूंकि इसमें भविष्य लक्षी वादे किये गए है अत: यह शपथपत्र नहीं है !!
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२) यदि किसी शपथ पत्र में भविष्य में किये जाने वाले कार्यो का वादा किया गया है तो यह शपथ पत्र न होकर एक "कॉन्ट्रेक्ट=करार" हो जाता है। करार होते ही इसकी प्रकृति बदल जाती है। यदि कोई करार किया जाता है तो करार में कम से कम दो पक्षकार होना जरुरी है। तथा करार को कानूनी रूप से वैध बनाने के लिए यह जरुरी है कि किसी पक्षकार द्वारा किये गए वादे के एवज में दुसरे पक्षकार द्वारा कोई लाभकारी भुगतान किया जाए। किसी प्रतिफल के अभाव में किये गए करार का कानूनी प्रभाव शून्य होता है। किन्तु उम्मीदवार द्वारा दिए गये शपथ पत्र में सिर्फ एक पक्षकार है , दूसरा पक्षकार नदारद है !! इस तरह यह करार "शून्य" है !!
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तो भविष्य लक्षी वादों के लिए दिया जाने वाला ऐसा शपथपत्र न तो कानूनी रूप से "शपथ पत्र" है और न ही यह कोई "करार" है। इसकी कोई कानूनी कीमत नहीं। अत: इस शपथपत्र का विचलन होने पर उम्मीदवार को अदालत में नहीं खींचा जा सकता है। अत: ऐसा शपथ पत्र सिर्फ एक चुनावी स्टंट है।
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यदि किसी उम्मीदवार को यह लगता है कि वह अपने वादों के प्रति ईमानदार है , और इतना ईमानदार है कि यदि वह अपने वादे पूरे न करे तो वह सहर्ष अपनी कुर्सी छोड़ देगा , तो अमुक उम्मीदवार को अपने चुनावी एजेंडे में राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट शामिल करने चाहिए। राईट टू रिकॉल क़ानून होने से मतदाताओ को यह प्रक्रिया मिल जाती है कि , यदि उम्मीदवार अपने वादे पूरे न करे , तो क्षेत्र के मतदाता बहुमत का प्रदर्शन करके ऐसे उम्मीदवार को खुद ही नौकरी से निकाल सके।
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यदि कोई उम्मीदवार वादे पूरे करने का "शपथ पत्र" देने को तैयार है किन्तु वह अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल के ड्राफ्ट शामिल करने को राजी नहीं है , तो यह तय है कि अमुक उम्मीदवार पर्याप्त रूप से चालाक है तथा उसकी नियत पहले से ही बिगड़ी हुयी है।
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