> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-09-06

Pawan Jury BhilwaraRj

धारा 377 - यदि भारत में "राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायधीश" का कानून होता था तो भ्रष्ट जजों के इस फैसले से क्षुब्ध नागरिक सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने की जगह मुख्य न्यायधीश को लात मारकर(*) नौकरी से बाहर निकाल सकते थे।
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दूसरा पहलु यह है कि यदि भारत के नागरिको के पास राईट टू रिकॉल जज का क़ानून होता था तो सुप्रीम कोर्ट के जजों में इतनी हिम्मत न आती कि वे मिशनरीज के आदेश पर इस तरह का फैसला दें। क्योंकि वे इस बात को अच्छी तरह से समझते है कि यदि जनता के पास हमे नौकरी से निकालने का अधिकार हुआ तो हमें ऐसे फैसले देने पर अगले 24 घंटे में नौकरी गंवानी पड़ सकती है। तो इस तरह राईट टू रिकॉल क़ानून बिना कोई हरकत किये अधिकारीयों को तमीजदार बनाये रखता है।
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कार्यकर्ताओ को अपनी भड़ास निकालने के साथ साथ इस बात पर विचार करने में अपना समय लगाना चाहिए कि जब तक भारत में राईट टू रिकॉल जज का क़ानून नहीं आता तब तक सुप्रीम कोर्ट के जज इस तरह के फैसले देते रहेंगे। कार्यकर्ताओ को यह तय करना चाहिए कि उन्हें सिर्फ अपनी भड़ास निकाल कर विरोध प्रदर्शित करना है , या वे जजों को जवाबदेह बनाना चाहते है। मेरे विचार में राईट टू रिकॉल के अलावा जजों को किसी भी तरह से काबू नहीं किया जा सकता।
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नोटा कोई विकल्प नहीं है , लेकिन विडंबना यह है कि भारत के नागरिको के पास जजों के खिलाफ नोटा जैसा भोटा अस्त्र भी नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट के जजों को लात मारकर बाहर निकालने के लिए प्रस्तावित राईट टू रिकॉल क़ानून का ड्राफ्ट यहाँ देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860420858820>;
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(*) लात मारकर नौकरी से बाहर निकालना -- इस टर्म के आविष्कारक हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र जी मोदी है। मोदी साहेब पहले व्यक्ति है जिन्होंने निष्कासन के लिए इस भाषा का प्रयोग किया। शायद वे किसी व्यक्ति को पद से हट दिए जाने को लात मारकर बाहर कर दिया जाना कहना ज्यादा पसंद करते है।
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धारा 377 पर रुख को लेकर मेरा प्रस्ताव है कि - भारत में सभी मुकदमो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा की जानी चाहिए। नागरिको का ज्यूरी मंडल किसी भी अपराध के लिए फैसला दे सकता है कि कितना और क्या दंड दिया जाना चाहिए या कब दंड नहीं दिया जाना चाहिए। इस तरह नागरिक समुदाय यह तय कर सकेगा कि वे अपने देश एवं समाज में किसी हरकत को किस सीमा तक वाजिब एवं गैर वाजिब ठहरना चाहते है। यदि अमुक मामले कि सुनवाई नागरिको की ज्यूरी कर रही होती तो इस तरह का फैसला आता ही नहीं।
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ज्यूरी सिस्टम का प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट यहाँ देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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