Pawan Jury BhilwaraRj
वालमार्ट द्वारा फ्लिप्कार्ट का अधिग्रहण ; इन बुलन्दो के नसीबो में है पस्ती एक दिन
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कुछ 3 वर्ष पहले फेसबुक पर संघ के एक स्वयंसेवक से स्वदेशी Vs विदेशी की बहस के दौरान मैंने कहा था कि - "फ्लिप्कार्ट अमेजन के लिए जमीन तैयार कर रहा है , और एक दिन अमेजन इसे टेक ऑवर कर लेगा। बिना जूरी सिस्टम लाये इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।" उन महोदय का कहना था कि यदि आप स्वदेशी के समर्थक हो तो स्वदेशी कम्पनियों से सामान खरीदो , लेकिन विदेशी कम्पनीयो का विरोध क्यों कर रहे हो !! मैं उन्हें समझाने का प्रयास कर रहा था कि जूरी सिस्टम के अभाव में स्वदेशी इकाइयां विदेशी कम्पनियों के सामने किसी भी हालत में नहीं टिक सकेगी। तो आज जो आप स्वदेशी अपनाने की सलाह दे रहे है , वह कोरी बकवास है। सिर्फ जूरी सिस्टम ही भारत की स्थानीय इकाइयों को इतना मजबूत बना सकता है कि वे विदेशी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा कर सके।
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जब 1977 में जनता सरकार ने भारत से कोक और पेप्सी को निकाल बाहर किया था तो पार्ले ने सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में अपने पैर जमाने की हिम्मत की थी। पार्ले ने तब तीनो फ्लेवर में 3 ब्रांड लिम्का , थम्स अप और गोल्ड स्पॉट उतारे थे। उसी समय केम्पा कोला ने भी अपना सॉफ्ट ड्रिंक लांच किया था। 22 साल तक ये कम्पनियां चलती रही। लेकिन 1991 में कोक और पेप्सी को फिर से भारत में आने की अनुमति दी गयी और 1 साल के अंदर ही कोक ने पार्ले के तीनो ब्रांड टेक ओवर कर लिए !! और केम्पा कोला का क्या हुआ ? लेकिन केम्पा कोला को पेप्सी-कोक ने बाजार से पूरी तरह बाहर कर दिया !! केम्पा कोला तब काफी बड़ा और पॉपुलर ब्रांड था। इसके अलावा सैंकड़ो छोटे मोटे स्थानीय ब्रांड भी उपलब्ध थे। लेकिन आज भारत में सॉफ्ट ड्रिंक के कारोबार पर 100% विदेशी कंपनियों कोक-पेप्सी का कब्ज़ा है।
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कुल मिलाकर , जिन जिन क्षेत्रो में विदेशी कम्पनियों को अनुमति दी जायेगी , उन क्षेत्रो में कुछ समय बाद आपको सिर्फ 2-3 कम्पनियां ही नजर आएगी। और भारत का पूरा बाजार इन कम्पनियों के कब्जे में होगा। रेल, उर्जा, ऑटो मोबाईल, मीडिया , निर्माण , कृषि , रक्षा , टेलीकोम , बैंकिंग , स्वास्थ्य , उड्डयन आदि सभी क्षेत्र धीरे धीरे विदेशियों के हाथो में जा रहे है। इसे मार्केट मोनोपॉली कहते है। बाजार पर एकाधिकार। और यह एकाधिकार विदेशी कम्पनियों का होगा।
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तो इससे हमें नुकसान क्या है ?
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विदेशी कम्पनी भारत में जो मुनाफा कमाती है उसके बदले हमें डॉलर चुकाने होते है। इस तरह जितना ही आप विदेशी कम्पनी से सामान खरीदेंगे उतना ही हमें ज्यादा डॉलर चुकाना होगा। हमारे पास डॉलर छापने की मशीने नहीं है। तो हम यह डॉलर हमारे संसाधन बेचकर चुकाने होते है। और हम लगातार यह चुकाते जा रहे है। जितना इन कंपनियों को मुनाफा होगा उतना ही हम डूबते जायेंगे। कुछ खच्चर इसी को "विकास" शब्द से जोड़ कर इसकी वकालत करते है !!
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इससे बहुत बड़े पैमाने पर स्वरोजगार एवं मालिकाना हक़ में कमी आती है। उदाहरण के लिए तब भारत में केम्पा , पार्ले के अलावा भी सॉफ्ट ड्रिंक के सैंकड़ो छोटे बड़े ब्रांड देश में चल रहे थे। मतलब सैंकड़ो ऐसे कारोबारी थे जिनके पास खुद का व्यवसाय था, उनके अपने प्लांट थे, और वे बाजार में खुद को बनाये रखने के लिए कम्पीटीशन कर रहे थे। लेकिन कोक-पेप्सी ने इन सभी इकाईयों को बंद करवा दिया।
फिर ये लोग क्या करते है ? अब ये लोग निर्माण जैसे उत्कृष्ट कार्य से बाहर होकर ट्रेडिंग एवं रिटेलिंग जैसे काम चलाऊ धंधे करने के लिए बाध्य होते है। मालिकाना हक़ खोने के बाद कारोबारियों का बाजार पर कोई नियन्त्रण नहीं रह जाता। क्योंकि वस्तु क्या होगी, कैसी होगी, इसका दाम क्या होगा यह मालिक तय करते है , रिटेलर और डिस्ट्रीब्यूटर नहीं। अब स्थानीय कारोबारियों के पास रोजगार के नाम पर सिर्फ नौकरी एवं सप्लाई का काम रह जाता है।
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जब निर्माण पर कुछ 2-3 कम्पनियों का एकाधिकार हो जाता है तो वे आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं करते , बल्कि ऊँची कीमतों पर माल बेचना तय कर लेते है। तब कीमतें आसमान छूने लगती है , और उपभोक्ताओं को इसके दाम चुकाने होते है। बचने का कोई विकल्प नहीं है। उदाहरण के लिए पिछले वर्ष फ्लिप्कार्ट , अमेजन और स्नेप डील तीनो कम्पनियां घाटे में रही। इन तीनो ने मिलाकर लगभग 12 हजार करोड़ का घाटा बनाया।
क्योंकि इन्हें आपस में एवं अन्य कंपनियों से कम्पीटीशन करना पड़ रहा है। जब बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है तो कम्पनियों के मुनाफे की दर सीमित ( लगभग 10-20% ) रहती है , तथा उपभोक्ता को फायदा होता है। लेकिन एक बार यदि मोनोपॉली बन जाए तो कम्पनियां अपनी वस्तु दुगने दाम में बेच सकेगी। और विकल्प नहीं होने से आपको दाम चुकाने होंगे। उदाहरण के लिए 2014 में फ्लिपकार्ट ने मिंत्रा को टेक ओवर किया , 2016 में जबोंग और फोन-पे को टेक ओवर किया और अब वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट को टेक ओवर कर लिया है !! अब स्नेप डील का नंबर है। फिर आपके पास सिर्फ अमेजन और वॉलमार्ट है !!
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तो हमारे पास क्या विकल्प है ?
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स्वदेशी अपनाओ का नारा लगाना और स्वदेशी वस्तुओ के इस्तेमाल की सलाह देना सबसे बड़ी बकवास है। विदेशी कम्पनियां ऐसे नारे लगाने वालो को पैसा देती है। क्योंकि ये नारे लगाने वाले लोग नागरिको को अव्यवहारिक विकल्प अपनाने की और धकेलते है जिससे समस्या के मूल समाधान की तरफ से कार्यकर्ताओ का ध्यान हट जाता है, साथ ही इनके नेताओ द्वारा इन्हे यह निर्देश होते है कि ये उन सभी कानूनों का विरोध करें जिनसे भारत की स्थानीय इकाइयों को विदेशियों से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाया जा सके।
इस तरह ये नारे लगते रहते है और विदेशी कम्पनियां भारतीय इकाइयों को टेक ओवर करती रहती है। फिर कार्यकर्ताओ का यह समूह "स्वदेशी अपनाओ" को देशभक्ति से जोड़ देता है। और नागरिको को कहता है कि तुम देशभक्ति की चपेट में आकर 1000 रूपये की चीज के 1500 रूपये चुकाओ। जबकि ये खुद भी सुबह से शाम तक विदेशी वस्तुओ का इस्तेमाल करते है, और बढ़िया क्वालिटी की सस्ती चीज खरीदने के लिए 25 दुकानों को खंगालते है !!!
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समाधान ?
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हमें ऐसे कानूनों की जरूरत है जिनसे हम भारत की स्वदेशी इकाइयों को वह प्रशासन दे सके कि भारत की इकाईया उसी दाम में विदेशी कम्पनियों की टक्कर के उत्पाद बना सके। सिर्फ तब ही भारत की इकाइयां विदेशी कंपनियों के आगे टिक पाएगी। और हमें अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक क्षेत्रो जैसे - ऊर्जा , टेलिकॉम , परिवहन , रेल , उड्डयन, खनन , रक्षा , बैंक , निर्माण , मीडिया आदि क्षेत्रो में विदेशी निवेश पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। शुरूआती दौर में प्रतिबंध लगाना इसीलिए जरुरी है कि अमेरिका में ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स और राईट टू रिकॉल ने अमेरिकी कम्पनियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए वाजिब माहौल उपलब्ध करवाया। अब उनके पास पिछले 200 सालों से ज्यूरी सिस्टम है, और इस वजह से उनकी कम्पनियां खा पीकर पहलवान बन चुकी है।
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तो पहले हमें अपने देश में ऐसी क़ानून व्यवस्थाएं लानी होगी जिससे हमारी कम्पनियां अपने आप को मजबूत बना सके। यदि भारत में राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स लागू कर दिया जाता है तो हमारा मानना है कि अगले 5-10 वर्षो में हम ऐसी कम्पनियां खड़ी कर सकेंगे जो अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों से मुकाबला कर सके। तब स्वदेशी अपनाओ के नारों की जरूरत नहीं रह जायेगी। क्योंकि उपभोक्ता जब देखेगा कि भारत की कम्पनी कम दाम में बढ़िया माल बना रही है तो वह विदेशी सामान नहीं खुद ही नहीं खरीदेगा।
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राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स आदि कानूनों के प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट्स देखने के लिए यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>
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उल्लेखनीय है कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल एवं इनके अंध भगत ऐसे सभी कानूनों का विरोध कर रहे है जिससे भारत की अदालतों में सुधार आये , भ्रष्टाचार कम हो और भारत में निर्माण इकाइयों के हालात सुधरें। संघ के सभी स्वयंसेवक भी इन कानूनों के कट्टर विरोधी है।
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तो मेरा कार्यकर्ताओ से आग्रह है कि वे इस बात को नोट करें कि किन कानूनों की वजह से अमेरिकी कम्पनियों में इतनी शक्ति आयी है कि वे दुनिया के किसी भी देश में जाकर सभी स्थानीय इकाइयों को निगल लेती है, और किन कानूनों के अभाव में भारत की कम्पनियां आज भी कमजोर प्रदर्शन कर रही है। मेरा मानना है कि एक मात्र वजह ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स एवं राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं है , शेष सभी अफ़साने है। तो जो भी व्यक्ति स्वदेशी अपनाओ के नारे लगा रहा है उनसे यह पूछे कि आप कौनसे क़ानून सुझाते है जिससे हम भारत की कम्पनियों को अमेरीकी-ब्रिटिश कम्पनियों से ज्यादा ताकतवर बना सके।
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