Pawan Jury BhilwaraRj
केशव बलिराम हेडगेवार भी गांधी ही थे !!! उनकी चारित्रिक विशेषताओ को ध्यान में रखते हुए उन्हें केशव हेडगेवार गांधी कहकर पुकारा जाना चाहिए !!!
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उन्होंने भी भारतीयों को हथियारबंद करने एवं चुनावी गतिविधियों में भाग लेने का विरोध किया था। अंतर सिर्फ इतना था कि -- (अ) हेडगेवार लाठी लहराने को चरखा चलाने पर तरजीह देते थे , (ब) -- साथ ही उन्हें यह भी लगता था कि "पतित पावन सीताराम" भजन की जगह यदि नियमित रूप से "वन्दे मातरम" की पुकारे लगायी जाए तो नतीजे बेहतर होंगे। (स) -- महादुरात्मा गाँधी ने कभी भी युनिफोर्म के महत्त्व पर कभी जोर नहीं दिया, जबकि केशव हेडगेवार गांधी युनिफोर्म को काफी महत्त्व देते थे।
लेकिन दोनों ही इस बात पर पूर्णत सहमत थे कि हमें ब्रिटिश साम्राज्य से टकराव को टालना चाहिए !! दोनों ही भारत के युवाओं को यह समझाने क मिशन पर थे कि यदि हमें आजादी चाहिए तो इसका सबसे सटीक और सुलभ तरीका समाज सेवा है। अत: आजादी की इच्छा रखने वाले युवानो को हथियार जैसे तलवार , धनुष आदि धारण नहीं करने चाहिए बल्कि अपनी उर्जा सामाजिक सेवाओ में खपानी चाहिए।
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दोनों ने देश के युवाओं के इतिहास की व्याख्या इस तरह से कि , जिससे वे हथियारों के ऐतिहासिक महत्त्व से अनभिग्य बने रहे। कोंग्रेस एवं संघ के इतिहासकारों ने भी इतिहास की व्याख्या करने के दौरान हमेशा से इस बात का ध्यान रखा कि इतिहास को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण घटक "हथियारों की गुणवत्ता" पर कभी डिस्कस नहीं किया जाए !!!
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इस तरह मोहन एवं हेडगेवार जी, दोनों ही गांधी थे।
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हालांकि हेडगवार जी को दुरात्मा के विशेषण से नहीं नवाजा जा सकता , क्योंकि हेडगेवार जी भारत को उतना भयंकर नुकसान पहुँचाने में सफल नहीं हुए थे, जितना कि मोहन ने पहुँचाया। इसकी वजह यह थी कि, हेडगेवार जी के पास मोहन के बराबर फंडिंग नहीं थी, और इस वजह से तब उनके अनुयायियों की संख्या सीमित रही। तो उन्होंने जो क्षति दी, वह अपेक्षाकृत कम थी।
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