Pawan Jury BhilwaraRj
सेंसर बोर्ड से पास होने के बावजूद सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5F एवं 6 के अनुसार केंद्र सरकार किसी भी फिल्म को पूरे देश में या कुछ राज्यों में बेन कर सकती है, और अदालत केंद्र सरकार के इस फैसले को चुनौती भी नहीं दे सकती।
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लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार को एक अधिसूचना निकालनी होगी जिसमें इन दो धाराओं को इंगित किया गया हो।
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कुछ उदाहरण देखिये :
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गुजराती फिल्म "पॉवर ऑफ़ पाटीदार" 2016 में बनायी गयी , और इसे गुजरात सेंसर बोर्ड ने विधिक रूप से रोक लिया ( फिल्म गुजराती भाषा में होने के कारण इसे गुजरात सेंसर बोर्ड से प्रमाणित होना था )। निर्माता अदालत में चले गए और यह मामला पिछले 2 साल से अदालत में लटका हुआ है !!
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भारत में कानूनी रूप से प्रतिबंधित फिल्मो की सूची देखें।
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इसी तरह से , भारत में कई किताबें प्रतिबंधित की गयी है। और संविधान किताबों एवं फिल्मो में "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" के नाम पर कोई फर्क नहीं करता। इन्हें एक ही श्रेणी में रखता है। तो जिस तरह से पुस्तके प्रतिबंधित की जा सकती है , उसी तरह से फिल्मो को भी प्रतिबंधित किया जा सकता है।
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गलीज़ फिल्म पद्मावत को अदालत द्वारा हरी झंडी दी गयी क्योंकि -- १) केंद्र सरकार के मुख्य नीति नियन्ता साहेब बिक गए और उन्होंने धारा 5F एवं 6 को निर्दिष्ट करते हुए अधिसूचना जारी नहीं की, २) जजों ने फिल्म के प्रायोजकों से घूस खा ली।
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इसके अलावा, यदि केंद्र एवं राज्य सरकारें चाहती तो इस फिल्म को भारतीय दंड संहिता की धारा 295 एवं 295A के तहत बेन कर सकती थी। यदि फिल्म को इन धाराओं के तहत बेन किया जाता तो केस मजबूत बनता और निचली अदालत में ही यह केस अगले 10 साल तक घिसटता रहता।
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कहने की जरुरत नहीं कि, मोदी साहेब, योगी जी , संघ के नेता एवं इनके कार्यकर्ता इस गलीज़ फिल्म का जबरदस्त समर्थन कर रहे है , और इसीलिए उन्होंने इस फिल्म को रोकने के लिए कोई भी आवश्यक कदम नहीं उठाये और उनकी जानबूझकर अनदेखी की।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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